Monday, October 2, 2023

    गांधी तुम चौकन्ने रहना !


गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे

दिल मे नफरत की आंधी रख झुक झुक फुल चढ़ाएँगे

इनके मन की कुंठा को  तुम तो खूब समझते हो

गोली खाकर भी इनकी तुम रत्ती भर ना लरजते हो

तेरी लाठी लेकर तुमसे ये अपना हथियार बनायेगे

गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे  | 


धर्म ध्वज की बात करेंगे और तिरंगे का अपमान 

पर इनकी मजबूरी देखो छीन ना सकते तेरा मान

क्षमा दया और प्यार की बंसी तुम तो खूब बजाते थे

पर उस दौर में भी ये नफरत की आग लगाते थे

इतिहास की बेदि पर बैठे ये उसकी धुनि जलाएंगे 

गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे | 


क्रूर क्रोधी और कामहीन ये प्यार की भाषा क्या जाने

आत्ममुग्ध और आत्मप्रवंचित नीरसता को जीवन माने

सत्ता की चाहत मे जब ये धर्म के ठेकेदार बने

हिन्दू मुस्लिम करते करते चोर से चौकीदार बने 

अब सत्ता के ठेले पर हर ओर नफरत बिकवायेंगे

गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे | 


दोष भी इनको क्या दे जब ये सोच ना अपनी गढ़ पाये

एक सदी के बाद भी जब ये देश की नब्ज न पढ़ पाये

इस देश का दिल ही सतरंगी है एक न भाषा एक न बोली

नानक और युसू भी मिलकर ईद मनायें और खेले होली

 देशभक्ति की आड़ में ये हर ओर नफरत फैलाएंगे

गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंग | 


सच तो ये है बापू तुमसे आज भी खूब ये डरते हैं

जितने फूल चढ़ाते उससे दुगनी नफरत करते है

मंदिर मस्जिद को इन्होने अपना हथियार बनाया है 

इस देश को इन्होने बस नफरत करना सिखाया है 

अपनी नफरत की भट्टी मे ये खुद ही जल मर जायेंगे

गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे | 

 दिल मे नफरत की आंधी रख झुक झुक फुल चढ़ाएँगे। 

Wednesday, August 18, 2021

आहट

जब बिना रीढ़ के अखबारों में राजा की बात हीं छपती हो,
जब कलम करे कोताही और खबरों की हेराफेरी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब भेड़चाल में सारी भेड़े ऊँचे स्वर में हुंकार भरे,
जब लाखों मौतों पर भी न कोई शासन का प्रतिकार करे ,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब धर्म का चोला ओढ़े कोई साधु बड़ा व्यापारी हो,
जब मठ का कोई मठाधीश शासन में सत्ताधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब अनपढ़ अवसरवादी राजा सिर्फ भूतकाल में बात करे,
और वर्तमान की चौखट पर भविष्य के साथ भी घात करे,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब मंदिर मस्जिद के मुद्दों पर सत्ता की दावेदारी हो,
जब सफेदपोशो के मंचो पर कोई टोपी या भगवाधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब केसरिया और हरा रंग अलग अलग लहराते हों,
छत की मुंडेरों से लटके अपनी मज़हबी पहचान बताते हों, 
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |


Wednesday, October 2, 2019

2 अक्टूबर

हम दंगा ख़ूब मचाएँगे फिर गांधी गांधी गाएँगे 
तुम लाठी लेकर चलते रहना हम बम गोले मरवाएँगे,
भय भूख से घिसट घिसट कर आना तुम चौराहे पर 
केसरिया और हरा दिखा कर नारे तुमसे लगवाएँगे।

लोकतंत्र और लोकाचार दफ़न कर देना क़ब्रों में 
और अपनी अपनी बस्ती को मजहबी मुंडो से भरना
एक रंग का साफ़ा बांधे दूजे रंग से नफ़रत करना, 
मेरी अन्ध्भक्ति में बौद्धिकता जब घुटनो तक आजाएगी
ग़ैर मजहबी मानव तन की लिंचिंग तुमसे करवाएँगे ।

ख़बरों में लिपटा रंग बिरंगी एक काग़ज़ का चीथड़ा आता है 
उन ख़बरें बूनने वालों से हम अपनी चालीसा लिखवाएँगे 
चित्रहार और रंगोली का जो बुद्धू बक्सा आया था घर में 
उसी बुद्धू बक्से पर हम तुमको अपना जलवा दिखलाएँगे

इतिहास का सबक़ तुम्हारे पुरख़ो ने बतलाया था जो 
उस इतिहास की भारी अर्थी हम तुमसे ही उठवाएँगे
तुम तोता बनकर पढ़ते रहना हम अपना इतिहास पढ़ाएँगे

तुम हाथ पसारे बैठे रहना हम सब्ज़बाग़ दिखलाएँगे
तुम नौकरी नौकरी गाते रहना हम देशभक्ति समझाएँगे 
तुम चीख़ मरना बिना अस्पताल के हम बीमा करवाएँगे 
फिर चुनाव जब आएगा हम पाकिस्तान से लड़ने जाएँगे।


हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई आपस में लड़ बनो कसाई
इस नए नारे से नये भारत का नया नक़्शा बनवाएँगे

Wednesday, January 11, 2017

थोड़ी दूर

कुछ टूट रहा है मेरे अंदर ,कुछ रिश्तो की डोर भी छूट रही ,
राह चले चलने की  जिद में ,मंजिल भी पीछे छूट रही ।

खूब सहेजा था वर्षो तक ,वो यादें जाने किधर गई ,
कुछ यारो की भी यारी थी ,जो प्यालो में घुल कर बिखर गई ।

कुछ तेरा था जो ले आया मैं ,कुछ मेरा था जो छोड़ दिया ,
कुछ कसमे वादे भी लाया था ,उन सबको कब का तोड़ दिया ।

एक घड़ा था रिश्तो का जो ,भरकर भी खाली रहता था ,
आज उन्ही कुछ नए रिश्तो में ,खालीपन से भर जाता हूँ ।

कल होगा बेहतर कुछ अपना ,पर कितने आज गवाऊंगा ,
जो बिखर रहा है रोज निरंतर वो किस किस को बतलाऊंगा ।

ये माना जीना आसां  है ,पर सूनापन तन्हाई है ,
दिनभर बातें करता हूँ जिससे ,वो मेरी ही परछाईं है ।

एकांत मेरा प्यारा है मुझको ,पर इतना भी ना की निर्जन हो ,
एक छोटी सी बगिया हो अपनी , उसमे थोड़ा सा सावन हो ।




Tuesday, November 22, 2016

I am a Progressive Patriot


इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में मृतक संख्या बढ़कर 146 हो गई है।  मृतकों में से 110 लोगों की पहचान की जा चुकी है और 97 शव परिजनों को सौंप दिए गए हैं।

सब चुप हैं, कोई सवाल नहीं कोई सफाई नहीं , मुआवजा बटने लगा है जाँच कमेटी बना दी गई है ।

अजी ये भी मरना कोई मरना है , कौन लेगा इसकी जिम्मेवारी , ऐसी मौत से किसी के खून में उबाल आता है भला ? ये तो हमारे ही लोग हैं हम जैसे चाहे मार दे ट्रैन में मार दे या पूल गिरा कर । भूखो मार दे या शराब पिला कर । यात्री थे, यात्रा पर ही थे ,जहाँ उतरना था वहाँ से थोड़ा आगे चले गए । कोई बॉर्डर पर खड़े थोड़ी न थे की देशभक्त या शहीद का दर्ज दे दिया जाये , ट्रैन में भला कोई देशभक्त होता है ?  देशभक्त या तो बॉर्डर पर रहता है या Facebook  और Twitter पर । जबतक  बॉर्डर के आस पास आपकी छाती में पाकिस्तान का बुलेट न लगे आपको देशभक्त कैसे माना जायेगा ।

यद् रहे हमारा खून तभी ख़ौलता है जब पाकिस्तान की बॉर्डर पर कोई मरता है नेपाल बर्मा या भूटान पर नहीं , बाकि आपकी मर्जी आप जहाँ मर जाओ ट्रैन में मरो या अस्पताल में , दारू पि कर मरो या बिना पिए ही मर जाओ।  दंगो में मरो या दर्शन में, मंदिर के लाइन में मरो या ATM की लाइन में ,हिंदुस्तान में बनी गोली से मरो  या किसी तलवार से काट दिए जाओ । बड़ा सवाल ये है की मरे कैसे ? सड़क दुर्घटना का शिकार हुए ? ट्रैन हादसे में मर गए ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? कितने मरे?........ 150 बस !



पता करो मुआवजा बट गया  न। ... बेचारे कितने दिनों से इस मुआवजे का इंतजार कर रहे थे मनोकामना अब पूरी हुई। जो बच गए वो अफ़सोस मना रहे हैं। कोई बात नहीं फिर से टिकट लेना यात्रा करना फिर किसी दिन संयोग होगा। इसी रेलगाड़ी के बारे में सोचते रहे तो बुलेट ट्रैन कैसे लाएंगे। हमारे नेता हाइवे पर जेट touchdown करवा रहें है आप लोग रेल का रोना रोते  रहोगे ।  You Know ....... There is a word called "Progressive Patriot" and you just don't know it. ... and therefore, both literally and figuratively you unable to see the big picture. 



हम स्मार्ट सिटी बनाएंगे अब जिस सिटी में आप साँस नहीं ले पा रहे हो उसपर टाइम क्यों ख़राब करे । हम बुलेट ट्रैन चलाएंगे स्काई ट्रैन चलाएंगे ये अंग्रेजो की बनाई रेल लाइन पर अपना हुनर क्यों बर्बाद करे ।
अब तो हम जापान और चीन की सहायता ले ले कर जापान और चीन से आगे निकलने की राह पर हैं । Opss.. sorry चीन नहीं , चीन के झालर का तो अभी बहिस्कार किया था, आगे सोचा जायेगा फिलहाल नहीं ।

फिलहाल तो गिनिये कितने मरे, कौन गया, कौन नहीं गया, किसने कितना बांटा ,किसने नहीं बांटा । किसके शासन में कितनी पलटी और कितने मरे।

और हाँ सबसे जरूरी बात ट्रैन दुर्घटना में मरने वालो का धर्म और जाति नहीं देखी जाती  , तो उसकी अभी कोई जरूरत  तो नहीं है अगली बार से देखेंगे  -----------




Friday, April 1, 2016

दिल्ली मेट्रो और उसका साम्यवाद


साम्यवाद और सहिष्णुता का जीवंत उदहारण देखना हो तो दिल्ली मेट्रो की सवारी कीजिये एकदम सहिष्णु और उदारवादी समतामूलक समाज जिसकी कल्पना कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने भी नहीं की होगी। उम्र,धर्म,जाति,लिवास,पेशा और हैसियत इन सबका चूरमा बनकर एक शब्द बनता है "यात्रीगण"।अलग अलग उम्र , धर्म और जाति के गण अपने अलग अलग लिवास में अपने पेशे के प्रति निष्ठा को मजबूत करते हुए अपनी हैसियत के हिसाब से मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते ही मेट्रो के पेट में समाने के लिए बेचैन दिखने लगते हैं यहाँ इन सब की एक ही पहचान होती है "यात्रीगण"। हुड्डा सिटी सेंटर से साकेत तक आने में ऐसा लगता है मेट्रो अपने गर्भावस्था का एक चरण पुरा करती है।

शाम के 6 बजे हुड्डा से MG रोड तक आते आते मेट्रो के डिब्बों का पेट पूरा फुल जाता है एकदम ठस, क़ुतुब मीनार आते आते  crawilling शुरू हो जाती है और साकेत आ कर ऐसा लगता है डिलीवरी हो गई , लोग फिसल कर सबसे पहले कार्ड लगाकर निकलने की होड़ में ऐसे भागते हैं जैसे अब दुबारा लौट कर नहीं आने वाले ,पर फिर सुबह होते ही जिस तेजी के साथ फिर प्रवेश करते हैं तो लगता है जैसे इन 12,13 घंटे की विरह बड़ी मुश्किल से गुजारी है।ठीक यही नजारा नोएडा सिटी सेंटर से राजीव चौक के बिच होता है।पर इनसबके बीच जो सबसे अच्छी बात होती है वो है अनुशासन।स्वनियंत्रित और स्वअनुशासित लोगो की भीड़ एक दूसरे से बिना कोई भेद भाव और बिना किसी परेशानी के बस चलती रहती है।सब व्यस्त हैं अपने अपने स्मार्टफोन के साथ, कान में हेडफोन लगाए हुए ,बिना एक दूसरे से बात किये हुए ,इनमे कुछ ही मेरे जैसे असमाजिक होंगे जो इस सब को किसी नजरिए से देखते होंगे ।

बाकि किसी भी यातायात के माध्यम में आप साथ चल रहे लोगो को उनके एकदूसरे से रिश्ते की पहचान कर सकते हैं पर मेट्रो में रिश्ते पहचानना मुश्किल है।अरे जनाब अनुशासन का ऐसा नजारा आपको मिल ही नहीं सकता की बीवियाँ भी बिना कुछ बोले पूरी यात्रा कर लेती है, कुछ अपवाद हर जगह होते हैं पर बीवियों को ऐसा अनुशासन सिखाने का काम अगर कोई कर सकता है तो इससे नायाब चीज आपको शायद ही देखने को मिले ।

हर स्टेशन का अपना अलग नजारा है जैसे साकेत के बाहर चबूतरे पर एक लाइन में बैठे लोगो का कारण आज तक नहीं समझ पाया आखिर किसके इंतजार में बैठे है।वहीं रेसकोर्स और जोरबाग स्टेशन देख कर लगता है यहाँ से कोई उतरता चढ़ता भी है या नहीं ? अगर कमाई के हिसाब से तन्खाह बटने लगे तो यहाँ के कर्मचारी को सुबह शाम की चाय मिल जाये वही बहुत है बाकि रोटी का खर्चा केंद्रीय सचिवालय स्टेशन से लेना पड़ेगा।राजीव चौक के कर्मचारी तो दुबई से एमिरेट्स का डेली पैसेंजर  पास बनाकर नौकरी कर रोज वापस दुबई जा सकते हैं।पर हाँ फिर भी कुछ बदलाव की जरुरत अभी भी है दिल्ली मेट्रो को बेहतर बनाने में।

⇛ मसलन, चढ़ने के लिए एस्केलेटर लगे हैं और उतरने के लिए सीढ़ियाँ मगर सीढ़ियों पर जिस कदर का सन्नाटा पसरा रहता है वहां गद्देदार स्लाइडर लगा देना चाहिए ।

⇛ बिना बेंच वाले डब्बे लगाने चाहिए ताकि सब खड़े होकर ही यात्रा करे इसके बिना मेट्रो के अंदर सम्पूर्ण साम्यवाद की कल्पना मुश्किल है वरना शुरुवात स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुलने के बाद लोग ऐसे दौड़ते है जैसे बाड़ा तोड़ कर भागी भैंस।सबको कुचलते मसलते हुए जिसको वृद्ध और महिलाओं की सीट छोड़कर सीट मिल गई उसके चेहरे का सुकून देखते बनता है ।
 
⇛ मेट्रो में खड़े हुए अपनी यात्रा के दौरान योग कैसे करे इसके निर्देश लगा देने चाहिए । मसलन अगर आपको बैठने की जगह न मिले तो दोनों हाथो से दो लटके हुए हैंडल को पकड़ कर तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें।इससे ज्यादा से ज्यादा शुद्ध हवा आपके फेफड़ों में जाएगी क्योकि मेट्रो से बहार निकलते ही फिर आपका सामना Ph level से होना होता है ।

⇛  सांसो पर नियंत्रण करने के लिए अपने सांसो को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बिच के अनाउंसमेंट के बिच रोक कर रखे ।शुरुवात छोटी दुरी के स्टेशन से करे ।

वैधनिक चेतवानी : गुड़गावं जाने वाले अर्जनगढ़ से गुरु द्रोणाचार्य के बीच श्वास नियंत्रण न करे वरना आपकी सांसे उखड सकती हैं ।

आप भी अपने सुझाव जोड़ सकते हैं ।कार छोडिए और मेट्रो के साथ साम्यवाद फैलाइये । 

Monday, July 20, 2015

किताब या धर्मग्रन्थ !


जो इंसानो की कदर करना भूल जाता है धर्म की रक्षा पर निकल पड़ता है ।जिस तरह गाय पालने वालो से ज्यादा गो रक्षा करने वाले हो गए है । फेसबुक और ट्विटर पर राष्ट्र्भक्त दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं लेकिन इनमे से सेना में कोई नहीं है ।अपनी छद्म राष्ट्रभक्ति और धार्मिकता को अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर एकदूसरे को निचा दिखाने का नया और सुलभ हथियार मिल गया है ।

हर सवाल के जवाब में इतिहास की कब्र खोद तथाकथित महापुरषो की अस्थियां दो मिनट में आपके दीवाल पर लटका दी जाएँगी ,अब इन्हे कोई ये क्यों नहीं समझाता की अस्थियां विसर्जित करने के लिए होती हैं वितरित करने के लिए नहीं |

इतिहास दफ़न करने के लिए लिखा जाता है कुछ सिखने के लिए नहीं ।इतिहास हमेशा युद्ध का ही क्यों लिखा जाता है ? ताकि आपको अगले युद्ध के लिए तैयार किया जा सके ? अगर इतिहास से सीखना होता तो द्धितीय  विश्वयुद्ध का नाम नहीं होता । हाँ उसी युद्ध को लड़ने के अलग तरीके जरूर ढूंढ लिए गए कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है तो कोई आतंकवाद के नाम पर। जो जीतेगा उसका इतिहास फिर लिखा जायेगा ।

जिस दिन इतिहास दफ़न करेंगे उस दिन इंसानियत के रास्ते का पहला कदम होगा वर्ना हर उस कदम को आपका इतिहास अपनी कब्र में खिचता रहेगा । सबकुछ साथ लेकर लुढ़कना आसान है पर चढ़ाई चढ़ने के लिए एक एक कर चीजो को छोड़ना पड़ता है । चुनाव तो आपका ही होगा अपने इतिहास की पोटली के साथ लुढ़कना है या अपने इतिहास के बोझ से हल्का होते हुए आगे चढ़ना है ।बस इतना ध्यान  रखियेगा की जितने बार अपने इतिहास के कब्र  में जायेंगे आपकी ऐतिहासिक पोटली और  भारी  होती जाएगी ।

दुनिया में लड़ाई कभी धार्मिक और अधार्मिक लोगो के बीच नहीं हुई है जब भी हुई है दो धर्मो के बीच हुई है ।  धार्मिक बनाना दुनिका का सबसे आसान काम है , बनिए धार्मिक पर एक किताब के साथ नहीं | अपने धर्म की किताब बदलते रहिये जब पिछले 1000 सालो में सबका पहनावा बदल गया ,खान पान बदल गया ,रहने से लेकर आने जाने का तरीका बदल गया, यहाँ तक की भाषा बदल गई हर 10 सालो में स्कूल कॉलेज का सीलेबस बदल जाता है पर सबके अपने अपने धर्म की किताब कभी नहीं बदली ।

ऐसा लगता है की उस आखरी लेखक की मौत के बाद कोई उससे अच्छा लेखक आज तक पैदा ही नहीं हुआ |  अच्छा है , नहीं बदलना चाहते है तो एक दूसरे से एक्सचेंज कर लीजिये , हो सकता है आपको अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का तरीका मिल जाये ।

किसी पर सवाल करना उसका अपमान करना नहीं होता बल्कि उसके साथ अपनी सहमति बनाने की कोशिश होती है फिर धर्म पर सवाल करने के नाम पर सारे असहज क्यों महसूस करने लगते है । क्यों धर्म की रक्षा के नाम पर तलवार की जरुरत होती है ? और क्यों रक्षा की जरुरत भी है ? क्यों कोई धर्म खुद के आडम्बरो से असहमत होने की इजाजत नहीं देता ? दो धर्मो को जब आपस में लड़ने का मौका नहीं मिलता तो एक ही धर्म में कई गुट हो जाते है फिर वो आपस में लड़ने लग जाते है ।

धर्म छोड़ना थोड़ा मुश्किल काम है इसके लिए आपको सारे भुत और भगवान के भय से मुक्त होना पड़ता है अपनी धार्मिक सोच से मुक्त होना पड़ता है । धर्मग्रन्थ को किताब समझ कर पढ़ना पड़ता है पूजनीय समझ कर नहीं , उसपर सवाल करने पड़ते है। कोई धर्म लेकर पैदा नहीं होता बल्कि पैदा होने के बाद धर्म चिपकाया जाता है और फिर उसे उखाड़ना बड़ा मुश्किल होता है ।धर्म छोड़ने का मतलब ये नहीं एक को त्याग कर दूसरे को अपना लिया, ये तो बस इस नाव से उस नाव में बैठने जैसा है । धर्म छोड़ने का मतलब खुद तैरना सीखना है किसी नाव की सवारी नहीं।

धार्मिक नहीं होना मतलब अधार्मिक नहीं होता ,हालांकि अधार्मिक जैसा शब्द भी धार्मिक लोगो ने ही ईजाद किया है ।  धार्मिक होना भी बुरा नहीं है पर अपने अपने धर्म की किताब हर 10  सालो में आपस में बदल लिया कीजिये ठीक उसी तरह जैसे स्कूलों सीलेबस बदल जाता है । या फिर इस झंझट से अच्छा है अधार्मिक हो जाइये और किताबो को किताब की तरह पढ़िए धर्मग्रन्थ की तरह नहीं । शायद एक दूसरे को धार्मिक पहचान के साथ नहीं उसकी पहचान से देखना सिख सकते है ।




Monday, June 8, 2015

Little किसान


भोर पहर के कोलाहल में उसने ,
डर कर सूरज को फिर देखा था।
उग आया था फिर पूरब से ,
विकराल और निर्मम होकर बिना किसी कोताही के ।

कुछ टूटी टहनी शाखों से बिखरी थी सुखी घासों पर ,
एक अलग सा रंग बिखरा था धरती की निर्मम छाती पर।
माघ में भादो की बारिश ने रबी की खेती को लील लिया, 
बनिए के पलड़े ने भी कुछ इधर उधर का खेल किया । 


एक बिटिया है वो भी छोटी है दुधमुँहा एक बच्चा भी है,
साहूकार का कर्ज खतौनी वो भी पूरा कच्चा ही है।
पसीने से लथपथ रहती है चूल्हा करती वो बेचारी ,
दो बैल और एक कुत्ता गिनकर सात पेट की भूख हमारी ।


शहरों में भी कोलाहल है अखबार तो ऐसा कहते हैं ,
भूख की उनको पर नहीं चिंता वो तापमान से डरते हैं।
हर नेता भी चिंतित है संसद की ठंढी लाल दीवारो में,
सहानुभूति भी दे रखी है खम्भो पर लगे इस्तिहारो में।

 
किसानो की आफत को सबने सर पर अपने टांग लिया है ,
पत्र्कार और बुद्धजीवी ने भी अपने कॉलम में बाँग दिया है।
रोज एक मुर्दे का किस्सा अन्नदाता के नाम पर रहता है ,
अनुदान की राशि बट गई ये हर सरकारी बाबू कहता है ।

थाली सबकी ये भरते है यह किस्सा तो सब कहते हैं ,
पर सबके जूठन की कीमत पर भूखे पेट भी ये मरते है ।
किस पत्थर को पूजे अब और किससे ये मनुहार लगाये  ,
या गलफांस लगाकर अब शांत शिथिल मृदुल हो जायें ।


Wednesday, November 19, 2014

हिसार (हरियाणा) : देवता और दानवों के बिच संघर्ष जारी !


हिसार: हरियाणा पुलिस अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद संत रामपाल को उसके हिसार के बरवाला आश्रम से गिरफ्तार नहीं कर सकी है। आज पांच दिनों के इंतजार के बाद पुलिस की करवाई दिन के 12 बजे से शुरू हो गई। आप बने रहिये हमारे साथ क्युकी अभी आपकी आँखों के लिए बहुत मसाला बाकी है |

कोई इसे मीडिया की नौटंकी तो कोई बाबाओ की कारगुजारियो के रूप में देख रहा है परन्तु असली भक्त वही है जो रामपाल और पुलिस के इस संघर्ष को देवता और दानवों के संघर्ष के रूप में देखे | हे भक्तो इससे आपके लिजलिजाये विश्वास को नया सहारा मिलेगा |

इस सत्संगी संसार में तीन प्रकार के प्राणी पाए जाते हैं बाबा
, भक्त और दानव बाबा और भक्त दोनों एक दुसरे की बैसाखी है | भक्त के बिना बाबा नहीं बाबा के बिना भक्त नहीं | बाबा या भक्त बनाये नहीं जाते ये तो पैदा होते है | हमारे यहाँ भक्तो की पैदावार ज्यादा है जो आतुर रहता या रहती है किसी ना किसी बाबा के संसर्ग में आने को और दानव वो है जो इन दोनों (बाबा और भक्त ) को शंका की दृष्टी से देखता है |


अजी लानत भेजिए इन मीडिया वालो को जो अपनी TRP रेटिंग के लिए इन बेचारो भक्तो का काम बढ़ाते रहते है | अब इन्हें नई शुरुवात करनी पड़ेगी एक नए बाबा की खोज में जो अबतक तकरीबन तठस्थ हो चुके भक्तो के विश्वास को धुल मल गया | ये मिडिया वाले भी दानवों के फ़ौज की ही एक इकाई हैं डंडे तो इन्हें पड़ने ही चाहिए थे | ये तो देवता का कमाल देखिये जो इनकी ही भस्मासुरो वाली बिरादरी की लाठी से इनकी मजम्त करा गया|

अब लड़ेंगे ये आपस में ही
, एक नया कमीसन बैठेगा इनके आपस के ही टकराव की जाँच को | दानव हथियार का सहारा लेता है और देवता दिमाग का | देवता और दानवों का यही अंतर तो जुदा करता है एक दुसरे से , वरना शक्ल तो सबकी एक जैसी ही होती है | तभी तो दानव रोज पैदा होते है और देवता कभी कभी अवतार लेते हैं | देवताओ की भी अपनी मज़बूरीयां है साहब की इन्ही दानवों की फ़ौज से इन्हें अपना भक्त बनाना पड़ता है जो जरुरत पड़ने पर अपने देवता के लिए हथियार उठा कत्लेआम मचा दे |

किसी पत्रकार ने लिखा की आश्रम की रिपोर्टिंग करते हुए वो आश्रम के अन्दर दानव से भक्त में  रूपांतरित हुए प्राणियों द्वरा वितरित की जा रही चाय भी नहीं पीते थे क्योंकी जिस दूध से चाय बनाई जाती है उस दूध का उपयोग पहले बाबा को नहलाने में किया जाता है, अब इस बात की सचाई वो ही जाने परन्तु इस चायरूपी प्रसाद का अनादर कर कोई देवता के प्रकोप से कैसे बच सकता है |

इनमे से कुछ वैसे भी होंगे जो इस बाबा की वजह से अपने बाबा पर भी एक बार शक किया होगा अब शक किया तो सजा तो मिलेगी वरना भगवान का भय ही ख़तम हो जायगा | भय से ही तो भगवान का विस्तार होता है | भक्तो अपने अपने भय को भी संभाले रखिये क्योंकी भय से भगवान और भक्ति दोनों आते हैं | जिस दिन आपने अपने अंदर के भय को मार दिया समझो भगवान और भक्ति दोनों मर जायेंगे | भगवान मरा तो भक्ति मर जाएगी , भक्ति मरी तो भक्त मर जायेगा , भक्त मरा तो बाबा मर जायेगा और ये पूरा तंत्र चरमरा सकता है इसलिए अपने भय को पालते रहिये |

भक्तो से विनती है की अपने अपने बाबा की तस्वीर और चरणपादुका अपने अपने घरो में संभाल कर रखिये ये आपके कमजोर होते विश्वास को सिंचित तो करेगा ही साथ ही साथ आपकी अधूरी मनोकामनाए भी पूर्ण कर आपको मोक्ष की प्राप्ति कराएगा |


वैसे मोक्ष तो भगवान को भी नहीं मिला है , वरना बार बार अवतरित कैसे होता
अजी इस सवाल को छोड़ दीजिये ये दानवों के सवाल हैं
|  


Wednesday, April 9, 2014

आप नाराज़ क्यू हैं ?


आप नाराज़ क्यू हैं ?

कोई मोदी से नाराज़ है ,कोई केजरीवाल से , कोई राहुल से नाराज़ है , कोई बीजेपी से , कोई  कांग्रेस से , कोई वाम से तो कोई आप से (अपने आप से अरविंद वाले आप से नही ) । इस नाराज़गी का आलम देखिये हर कोई एक को छोड़कर बाकि सबसे नाराज़ है ,एक से ही नाराज़ होकर रहेगा तो NOTA दबाना पड़ सकता है| आप सबकी नाराज़गी किसी ना किसी पार्टी को लेकर है , व्‍यवस्था को लेकर तो बिल्कुल नही है व्‍यवस्था को लेकर नाराज़ रहते तो इस महान लोकतंत्र के पावन पर्व का बहिकार ना कर देते, लेकिन आप ऐसा कर नही सकते क्योकी आप को भी पता है की ये व्‍यवस्था भी आपने ही बनाई है |

आप उस समाज का हिस्सा है जो सुबह सड़क पर टट्टी करके दोपहर मे खुद चिल्लाता है किसी ने साफ क्यू नही किया? आप उस सारे अनैतिक कामो पर ताली बजाते है जो आप खुद करना चाहते है , वैसे भी ताली और ग़ाली इन दो कामो के अलावा आपने कुछ सीखा भी तो नही  |  आप या तो खुद को दिखाए जानेवाले सपनो पर ताली बजा सकते हैं या उन सपनो के पूरा नहीं होने पर गाली दे सकते है । आप उस समाज का हिस्सा है जो भूत और भविष्य मे जीता आया है ,वर्तमान से तो कोई सरोकार ही नही , आप भूतकाल मे विश्वगुरु थे और भविष्य मे सुपर पावर होने जा रहे है , वर्तमान मे क्या है ये तो देखने की फ़ुर्सत कहाँ आपको । है  क्या ? आप की नज़र तो भूत और भविष्य का मेल कराने की है |

माफ़ कीजिएगा भाववेश मे कुछ ज़्यादा ही बक गया , मेरा इरादा आपकी भावनाओ को आहत करना नही था । अब भावना की बात आ ही गई तो एक बात और कह ही देता हूँ, यही एक चीज़ है जो आप अपने साथ हमेसा अपने साथ लेकर चलते है अरे जनाब इतनी नाज़ुक चीज़ कही संभाल कर रखिए घर मे कही तिजोरी मे बंद कर के रखिए या कही सरकार से कह कर बैंक ही खुलवा लीजिए , लेकिन आप भी कितने भोले है जो हर किसी को दे देते है इसे आहत करने के लिए | कोई मंदिर के नाम पर, कोई मस्जिद के नाम पर , कोई कश्मीर के नाम पर तो कन्याकुमारी के नाम पर, जाती ,धर्म ,किताब ,सिनेमा ,आचार ,विचार, ख़ान ,पान ,कपड़ा ,लता, लोक ,लाज हर चीज़ से तो आप आहत हो जाते हैं| आप आहत हो यहाँ तक तो ठीक है ,पर जनाब आप अपने साथ आस पास को भी आहत करने लग जाते है | उफ़ ये बात भी कहाँ से कहाँ तक चली आई |

अब बस !

बात तो चुनाव की शुरू हुई थी ये खामखां आपको कोसने मे लग गया , मै  तो बस ये जानना चाहता था कि आप अपना चुनाव  कैसे करते हैं ? फेसबुक से ?ट्विटर से ? शहर में लगे बड़े बड़े होर्डिंग से ? नेता जी के कहे भाषण से ? अपनी जातीय और धार्मिक कट्टरता से ? विकास  के मैनिफेस्टो से ? या फिर कुछ ले दे कर ? कुछ तो जरुर एकदूसरे से अलग करते होंगे वर्ना एक ही पार्टी को देश का बेडा गर्क करने का दोषारोपण करने में आपको ६० साल लग गए । दूसरी जिसके सपनो पर सवार होकर उड़ान भरने वाले थे उसे ५ साल में ही हटा दिया और फिर से पहली को ही ले आये क्योंकि इसबार इसने आपको नए सपने दिखाए । आज फिर से वही रोना । अबकी बारी किसकी है ? इसबार तो आपको सबने आपके समय के हिसाब से सपने दिखाए हैं । कोर्ई राशन दे रहा है, कोई रोजगार , कोई स्मार्ट सिटी,
तो कोई व्यापार, कोई बुलेट ट्रैन तो कोई मुफ्त में खाने का जुगाड़।

किसी ने आपके वर्त्तमान को ठीक करने का दावा तो नहीं किया और आपने भी तो नहीं पूछा , अरे पूछते भी कैसे आप तो वर्त्तमान को देखते ही नहीं हो,आपके उपर तो अपने सुनहरे अत्तीत को अति सुनहरे भविष्य से मिलाने कि जिम्मेवारी  है । अगर पूछते तो ये तो जरुर पूछ सकते थे कि "भाई मेरे"  मेरे जो शहर  है उन्ही को ठीक कर दो पहले, स्मार्ट तो बाद में हो ही जाएंगे । अभी चलने वाली रेलगाड़ी ही सही से चला दो बुलेट कि बाद में देखि जायेगी । मेहनत कि रोटी खाने का मौका दे दो अन्न योजना कि जरुरत किसे है ?

लेकिन एक बात तो है आप जागरूक मतदाता है किसी न किसी के साथ आपका मत तो जुड़ ही चूका है और ऐसा करने से पहले एक बार तो आपने जरुर ही देखा होगा कि जो आपकी अगुवाई करने का दावा कर रहा है उसका मिजाज आपके मिजाज़ से कितना मेल खाता है । नहीं देखा क्या ?
अरे मै तो भूल ही जाता हूँ आप तो सिर्फ भविष्य देखते हो वर्त्तमान से आपका सरोकार कहाँ , आप के ऊपर तो देश के भविष्य कि जिमेदारी दी गई है बेशक आप कल सुबह उठ कर फिर उसी सड़क पर टट्टी  करके दोपहर में चिल्लाओगे कि किसी ने साफ़ क्यों नहीं किया । आप अपने अपने इलाके का ही सोच लेते तो देश का कुछ तो भला हो ही जाता ।

फिर भी कही आपको लगे कि अपने नेता जिसे आप वोट देने जा रहे है कम से कम एक बार उसके द्वारा दाखिल प्रमाणपत्र देखना चाहिए तो निचे दिए लिंक पर क्लिक कर के अपना राज्य और अपना क्षेत्र चुन कर नेताजी के नाम पर क्लिक कीजिये देखिये क्या क्या कहा है उन्होंन अपने बारे में, अब जब खुद ही कहा है तो कुछ तो सच जरुर ही होगा ।

http://affidavitarchive.nic.in/DynamicAffidavitDisplay/FrmElectionAffidavit.aspx

इस लेख का किसी पार्टी और पॉलिटिक्स से कोई सरोकार नहीं है इसका मकसद सिर्फ आप को कोसना था








Friday, December 27, 2013

हमारी उम्मीदे ग्लोबल और सोच कट्टर होती जा रही है

हमारी उम्मीदे ग्लोबल और सोच कट्टर होती जा रही है | हम मल्टीनेशनल में काम करना चाहते हैं , ग्लोबल ब्रांड पहनना चाहते हैं और US का वीजा भी चाहते है लेकिन नेता हिंदूवादी चाहते है जो हमारे कट्टरपन पर रंग रोगन करता रहे | हम पढ़ते Dan Brown और Paulo Coelho को हैं नहीं भी पढ़ा है तो नाम तो जरूर लेते है अगर प्रेमचंद या फनीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा है तो नाम नहीं लेते इससे पिछड़ेपन को बोध होता होगा, मगर अपनी धार्मिक अन्धता को प्रदर्शित करने में हमे जरा भी हिचक नहीं होती है | मुझे हिंदूवादी सोच वालो से कोई शिकायत नहीं पर मै उन्हें कभी सहन भी नहीं कर पाता उसकी वजह भी एक ये है की उन्हें अपनी खुद के द्वारा कही बात का वजन ही नहीं पता वो अपनी दो टक्के की बात भी हजार टेक वाले दंभ के साथ कहते हैं | वैसे समर्थको के ज्ञानचछु खोलने के लिए एक कट्टर हिंदूवादी को नेतृत्व देना चाहिए | भोजपुरी की एक कहावत है  “हाथी आइल हाथी आइल हाथी पदलख टे “ | एक बार हाथी को देख लेने में ही इस देश का भला है कम से कम कुछ सालो के लिए ही सही बाकि हिंदूवादी हाथी जो हिन्दुवों को अल्पसंख्यक मानते है वो दुहाई देना  बंद कर देंगे |

 हर हिंदूवादी नेता के समर्थक हिन्दुवों को एक पीड़ित और शोषित के रूप में इंगित करते है और अपने नेता को हिन्दुवों का तारणहार जबकि हिन्दुस्तान में हर जाति हर वर्ग जो जहाँ अल्पसंख्यक है खुद को शोषित के रूप में देखता है कहीं हिन्दू-मुस्लमान जहाँ हिन्दू-मुसलमान मिश्रित न हो वहां जातिगत आधार पर | और हर ऐसी जगह कोई छोटा या बड़ा तारणहार हो ही जाता है जो अपने बूते के बाहर की बात के लिए अपने से बड़े तारणहार की दुहाई देता है और ये बड़े तारणहार आपकी वक्तिगत झगड़े को धर्म और जाति के लफ्जो लुवाबो के साथ लपेट कर धार्मिक और जातीय फसादों में तब्दील करना बखूबी जानते है |

धार्मिक कट्टरता का हमारी शिक्षा से कोई सरोकार नहीं ये तो बस उपज जाती है , इसका बीज तो हम सब में अपने जन्म के साथ ही पड़ा रहता है हम और आप इसपर कितनी मिट्टी और कितना पानी देते हैं उस हिसाब से ही अंकुरित होकर पनपता रहता है | एक बार पनपने के बाद ये हमारी हैसियत के हिसाब से ही बड़ा होता चला जाता है इसी की आड़ में हम कभी खुद को राजा तो कभी शोषित घोषित करते रहते है | जैसे जैसे हमारी हैसियत बढती जा रही है वैसे वैसे हमारी कट्टरता भी तीव्र होती जा रही है मसलन पहले दंगे किसी घटना या दुर्घटना से प्रेरित होते थे , आजकल तो हम facebook के एक झूठे विडियो पर भी अपने धर्म की ठेकेदारी कर मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं |

 धार्मिक से ज्यादा अधार्मिक कोई दूसरा नहीं होता इनकी भावनाये इतनी कोमल होती है की हर दुसरे दिन आहत होकर जख्मो को भरने के लिए रक्तरंजित करने से भी नहीं चुकती और अधार्मिक की धार्मिकता को ठेस मारना बड़ा मुश्किल होता है | इंसानियत की परिभाषा शायद अधार्मिकता में ही छुपी है इसलिए ग्लोबल धार्मिक होने से अच्छा है देशी अधार्मिक बनिए | इंसानियत की अदब सिखने का यह प्रयोग बुरा नहीं है कर कर देखिये शायद हम अपने समाज की कमजोरियों को खुद ही मिटा पाए बिना किसी राजनितिक उथल पुथल के |

Monday, June 17, 2013

ट्विटर और ब्लॉग में फर्क है !

ट्विटर और ब्लॉग में बड़ा फर्क है, ये वही फर्क है जो जनता और नेता में होता है, वो फर्क है जो बाबा और चेलो में होता है| ब्लॉग आपको वक्ता बनाता है बेशक आपके विचारो में कूड़े की सड़ांध हो और ट्विटर तर्की और कुतर्की | फेसबुक को मै किसी श्रेणी में नहीं रखता ये डस्टबीन है जहा कुछ भी फेक कर चले जाओ कोई न कोई  कूड़े वाला कुछ ना कुछ उठा ही लेगा, नहीं उठा तो वही पड़ा पड़ा बजबजाता रहेगा और आप हर दिन ये सोचते रहेंगे की किसी ने उठाया क्यों नहीं ? ब्लॉग एक अहसास  देता है खास होने का जहाँ एकतरफा संवाद की गुंजाईस ज्यादा रहती है और जहाँ एकतरफा संवाद की प्राथमिकता मिलती है, वो अहसास आपको विशिष्ट होने का अनुभव कराता है | अब भला विशिष्ट होना किसे बुरा लगता है , नेता स्टेज से चढ़ कर भाषण देता है समर्थक सुन कर ताली बजाते है विरोधी गाली, मगर एकतरफा संवाद का अहसाह कितना सुखद होता है यह उस नेता के अलावा कोई नहीं समझ सकता | बाबा प्रवचन कहते है चेले सुनते है जिन्हें नहीं अच्छा लगा वो अपने घर जा कर बाबा की फजीहत करेंगे, मगर बाबा के प्रवचन के विशिष्ट होने का अहसास आप तब समझेंगे जब आप बाबा हो जायेंगे|


 इसीलिए मै सबको कहता हूँ , बाबा बनो चेला नहीं ,डायरेक्ट बाबा बनने में जो मज़ा है वो चेला बन कर बाबा बनने में नहीं है | वही ट्विटर आपको विशिष्ट से आम की श्रेणी में ले आता है | क्योंकी इसमें दोतरफा संवाद का चलन है आपके दो लाइन के विचार पर कोई एक या दो लाइन की टिपण्णी करेगा, फिर से आप दो लाइन का जवाब तैयार करेंगे फिर कोई दो लाइन चिपका कर निकल लेगा| ये बराबर लाइनों का कारोबार हमे कुछ ज्यादा ही उत्तेजित भी कर जाता है और हमे अपने खास होने के चोले के फटने का अहसास होने लगता है | भोजपुरी में एक कहावत है "पडले राम कुकुर के पाले खीच खाच के कईले  खाले "मतलब राम का सामना कुत्तो से होता है तो कुत्ते राम को भी नोच खसोट कर गड्ढे में गिरा देते है और राम ये सोचने पर मजबूर हो जाते है की कुत्तो से लगा ही क्यों ? और फिर शुरू हो जाता है रास्ते से संभल कर चलना कुत्तो  से बचते हुए भाई आखिर खास बने रहना है या नहीं ? मेरे दो पेज के ब्लॉग पर कोई दो लाइनों की टिपण्णी करता भी है तो क्या औकात है उस टिपण्णी की टुच्ची टिपण्णी "हुह"


मगर ट्विटर पर ये सहूलियत नहीं है |१२० शब्दों में अपनी बात को समेटना कितना मुश्किल काम है और इतने मुश्किल से सहेजे गई विचारो पर कोई १२० शब्दों की टिपण्णी कर दे वो भी आपके विचारो का खुलेआम कत्त्लेआम करते हुए तो ये कोयल को चिढाने वाली बात है की नहीं ? उसके सुर वाले "कुं " पर किसी का बेसुरा "कुं " कोयल को कितना परेशान करती है, अब बेचारी कितना "कुं कुं " करती रहे | है हिम्मत तो जरा कौवे को चिढ़ा कर दिखाओ | यही कारण है की विशिस्ट लोग ट्विटर से किनारा कर ब्लॉग का सहारा लेने लगे है | वो पुराने दिन चले गए जब ट्विटर पर उपस्थिति खास मानी जाती थी अब सबकी किस्मत शशि थरूर वाली किस्मत तो होती नहीं है! ट्विटर पर होना अब बड़ा आम माना जाने लगा है और खास से आम होना कितना दुखदायी होता है |कोई धनि शौक से उपवास करता है तो इसका ये मतलब न निकला जाये की उसके पास खाने को नहीं है , ठीक उसी तरह कोई शौक से दो चार दिन के लिए आम हो जाता है तो हमेशा  के लिए आम हो जाये ऐसा कैसे हो जायेगा |जिस दिन उसे ये अहसास होने लगेगा की ये लो ये तो फोल्लोवर की भीड़ मुझे आम समझने लग गई उसी दिन वो ट्विटर को छोड़ ब्लॉग पर शिफ्ट कर जायेगा |


मेरे भी उंगलियो की गिनती जितने फोल्लोवर मुझे जब से आम समझने लग गए मै भी ब्लॉग पर शिफ्ट कर गया हूँ | मेरे पोस्ट कम है इसका मतलब ये मत समझ लीजिये की मेरे पास विचारो की कमी है , अजी ये सोचिये की टाइम ही नहीं मिल पाता की अपनी सोच को आपके सामने रोज रोज परोश कर मै भी विशिस्ट हो जाऊ |


Monday, February 18, 2013

साहेब सटल और दामिनी


दिसम्बर के महीने में धुंवे, धूल और धुंध से लिपटे हुए आंकड़ो में बड़ी तेजी से उभरते हुए बिहार की राजधानी पटना के  रेलवे स्टेशन का भोपा अचानक से चीखा "यात्रीगण कृपया ध्यान दे इस्लामपुर पटना बक्सर पैसेंजर ट्रेन 6 नंबर पर आ रही है "| यात्रियों का रेला अपने अपने कंधे पर बोझ लटकाए एक दुसरे के प्रतिस्पर्धी बने 4 से 6 नंबर प्लेटफार्म की ओर कूच करने लगा, जो अब तक बोर्ड पर लिखे सूचना के आधार पर 4 नंबर पर जमावड़ा लगाये हुए था । सबको जल्दी है घर पहुचने की और उससे ज्यादा अपने दिनभर की भाग दौड़ से बेदुम हुए टांगो को सहारा देने के लिये एक आसन की जो शायद किसी रेलमंत्री की कृपा से पटरी से गद्देदार सकल ले चुका है । इस ट्रेन का भी अपना एक गौरान्वित इतिहास और वर्तमान दोनों है । इस्लामपुर पटना बक्सर पैसेंजर उर्फ़ "साहेब सटल" पटना से आरा तक इसे राजधानी एक्सप्रेस से उपर का दर्जा प्राप्त है , मजाल नहीं किसी ट्रेन की जो इसे रोककर आगे निकल जाये ।

जितनी सवारी पटना राजधानी एक हफ्ते में ढोती है उतनी ये अपने एक फेरे में । इस ट्रेन के महिमामंडन से मेरा कोई खास संदर्भ नहीं है परन्तु चर्चा जरुरी लगी अमूनन ये एक डेली पैसेंजर ट्रेन है कामकाजी लोगो के लिए और इसमें यात्रा करना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव है । बेशक आपको कही से कोई सहुलियत न हो फिर भी अगर आप किसी क्षेत्र के सामजिक परिवेश और लोगो के सोचने के तरीके के बारे में जानने की उत्सुकता रखते है तो लोकल पैसेंजर ट्रेन एक बेहतरीन जरिया है ।उसी जरिये में मै भी सवार हुआ पटना से आरा तक की यात्रा के लिए बिना किसी जल्दबाजी के लोगो की रेलमपेल ख़तम होने के बाद । सबकी अपनी अपनी सीटो की दावेदारी खिड़की के रास्ते रखे रुमाल टोपी और मफलर के पहचान के साथ चिन्हित हो रही थी। मै भाग्यशाली रहा की थोड़ी देर खड़े रहने के बाद एक युवा ने अपने सामने की सीट पर मुझे आमंत्रित किया जिसपर काफी देर से उसने अपना बैग रखा था । "एक दोस्त का इंतजार कर रहा था आया नहीं आप बैठ जाओ " शायद हमउम्र का आर्कषण रहा हो । इस ट्रेन में आपको बिना किसी नेता की अगुआई के अपनी अपनी पार्टी और नेता की दलीलों के साथ सफ़र करने वाला समाज मिलेगा । नेता और इलीट इस ट्रेन में सफ़र नहीं करते वो गरीब रथ ,पूर्वा एक्सप्रेस और मगध एक्सप्रेस के एसी डब्बो में बिना टिकट की लोकल यात्राये करते है और उनका समाज MST पास के साथ साहेब सटल में ।

लोगो के आपस में बातचीत से आप उनके पेशे और उनकी गंभीरता का अंदाजा लगा सकते है । मेरे इर्दगिर्द कुछ सचिवालय कुछ बैंक और कुछ कॉन्ट्रैक्ट शिक्षको का समुह था जिसमे 7 , 8 शिक्षकाए भी थीं । कॉन्ट्रैक्ट टीचर की बिहार में चाहे जितनी शिकायत हो पर इसमें मै एक सकारात्मक पहलु हमेशा देखता हूँ । इसने महिलाओ को अपनी दावेदारी इस पित्रसतात्मक समाज में थोड़ी धमक के साथ रखने का मौका दिया है । सब अपने अपने समूह में बंटे अपनी अपनी अलग चर्चा में लगे हुए थे । कॉन्ट्रैक्ट टीचर के समूह में कुछ की चर्चा उनके काम के जगह ,वेतन,और रोज इस ट्रेन से अनजाने की कवायद से हट कर प्रभारी के साथ अपने CL और PL की छुट्टियों के विवाद पर केन्द्रित हो गई । यह एक व्यापक समस्या है हिंदुस्तान में हर वरीय अपने कनीय कर्मचारी की छुटियो पर अपनी सहमती की मुहर लगाने के एवज में अपने एहसान और परोपकार की स्याही जरूर पोतता है चाहे वो सरकारी दफ्तर हो या MNC का वातानुकूलित प्रांगन । इन शिक्षकाओ के समूह से एक महिला अपने एंड्राइड मोबाइल की स्क्रीन पर किसी सिनेमा का लुफ्त अपने दो और सहयोगी शिक्षका के साथ उठा रही थी जो वहां बैठे हर शख्स को नागवार गुजर रहा था ।

तभी से किसी ने व्यंग किया "नितीश का राज है भाई क्या कीजियेगा " मगर उस महिला के त्वरित सवाल "कौन बोला" ने उन सज्जन को अपनी पहचान छुपाने पर मजबूर कर दिया , लेकिन उस महिला का सवाल "कौन बोला" दो तीन बार लगातार उस गुमनाम आवाज को तलाशता रहा अपने उसी दृढ़ता के साथ । उत्तर ना पाकर उस महिला की सहयोगी ने उसे चुप कराया "छोडो जाने दो समाज बोला किस किस से लड़ोगी "
त्वरित उत्तर "मै अपना मनोरंजन कैसे करती हूँ ये मेरी पसंद है समाज को परेशानी है तो बोलो अपने घर में रहे " और फिर से मशगुल हो गई । थोड़ी देर तो शांति रही लेकिन सबके दिल में उसी की बात उथल पुथल मचा रही थी इसका अंदाजा मुझे भी था । अब इसी समाज में खड़े पुरुष जत्थे ने दिल्ली में हुए बलात्कार की चर्चा शुरू कर दी जो मेरे ध्यानाकर्षण की प्राथमिकता बन गई।

अभी अभी आया था दिल्ली के उस दर्द को इंडिया गेट पर मोमबती की शक्ल में जलते हुए , पानी के बाछौर के बिच उबलते हुए और पुलिस की लाठियों के बिच तड़पते हुए देखकर । दिल्ली से दूर बैठा समाज इस घटना के पुरे परिवेश पर क्या सोच रखता है शायद ये जानने की उत्सुकता रही हो । अब ये चर्चा अनायास ही समय काटने की थी या उस महिला को इस चर्चा से अपने पुरुषत्व का अहसास कराने की थी इसका अंदाजा लगा नहीं पाया या शायद लगाना नहीं चाहता था क्योंकी इस चर्चा में बहुत लोगो ने उत्सुकता जाहिर कर दी थी । अब बात बलात्कार से उठ कर पहनावे की निर्लजता और समय की पाबंदीयो पर आ चुकी थी । सब दिल्ली के अपने अनुभव को अपने तरीके से नमक मिर्च के साथ परोसने लगे की कैसे दिल्ली की लड़कियां रात के 1 बजे  तक घुमती है और कितने की बियर एक बार में पी जाती हैं इसमें सबसे उच्चतम आंकड़ा 2400 का रहा ,जो एक सज्जन ने कहा की एक लड़की 2400 का बियर एक बार में पी गई ये उसी को देखकर बियर बार में गए थे तो पता चला 1 बियर 400 रुपये की है तो वापस लौट आये । तब तक ट्रेन नेउरा स्टेशन पहुच चुकी थी और "कौन बोला" सवाल के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली महिला भी अपना मनोरंजन स्थगित कर इनकी चर्चा में दिलचस्पी लेने लगी थी इसका पता तब चला जब कुछ सवालो के साथ उसने अपना विरोध दर्ज कराया ।


आपको लडकियों के बियर पिने पर आपति क्यों है ?
लड़की बियर बार में नाच सकती है तो पी क्यों नहीं सकती ?
आप देखने गए थे की उस लड़की ने क्या पहन था की बलात्कार हो गया ?


कम से कम 3 मिनट तक निर्वघन एकाकी संवाद बिना किसी जवाब का इंतजार किये चलता रहा ,शायद उस महिला ने इस पुरे सन्दर्भ में उस दामिनी में अपना अक्स देख लिया था और इन तमाम मर्दों की गन्दी निगाहों से बचाने की जद्दोजहद में जूझती नजर आने लगी । थोड़ी बहुत आपत्ति और अनापत्ति के दौर के बाद फिर से कुछ देर की ख़ामोशी पसर गई इस सवाल के साथ की "ट्रेन कहा पहुची ?" । धुंध ने वैसे भी ट्रेन की रफ़्तार पर कब्ज़ा जमाया हुआ था । सारे फिर से अपने अपने बिना विवाद की चर्चा के विषय तलाशने लगे पर इन सबके बिच उस मुखर महिला के औरत होने का भय भी मै देख पा रहा था जो हर दुसरे मिनट पर अब किसी को फ़ोन कर ट्रेन के थोड़ी देर में जमीरा हाल्ट पहुचने की सुचना दे रहा था । जो उसके अपने विरोध के तरीके या सात बजे शाम में धुंध और अँधेरे से घिरे जमीरा हाल्ट प्लेटफार्म से उसके घर की दुरी के कारण भी हो सकता था । साथ में ये भी सबको सूचित करते हुए की "मै किसी से डरती नहीं हूँ एक मिस्ड कॉल से मेरे सारे भाई और चाचा 1 मिनट में स्टेशन पर आ जाते हैं " । उसका डर अपने सुरक्षा का ताना बाना भी बुन रहा था ।जमीरा हाल्ट के बाद आरा स्टेशन पड़ता है जहाँ के बाद इसी साहेब सटल की बादशाहत को चुनौती देती तमाम ट्रेने इससे आगे निकलने लगती हैं , ट्रेन भी अमूनन खाली हो जाती है । ट्रेन से उतरते हुए मै उस जमीरा हाल्ट की महिला , दिल्ली की दामिनी और हमारे समाज के बलात्कारी होने अथवा हो जाने की मानसिकता की दलीलों में खोया हुआ अपने घर की तरफ बढता रहा | इस सोच के साथ की दामिनी के चले जाने का गम सिर्फ इंडिया गेट पर जमा हुए लोग ही नहीं पाल रहे हैं , बल्कि दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर जमीरा हाल्ट की एक "Contract Teacher" जो रोज शायद पटना के आसपास पढ़ाने जाती है उसके दिल में भी सुलग रहा है ।

















Friday, January 18, 2013

उम्मीद

हम रोज दफनाये जाते है थोड़ी और गहरी कब्र में,
मायूस मुलाजिम की तरह अपनी नाउम्मीदीयो के साथ।

उम्मीदों के टूट जाने का हस्र बहुत ही बुरा होता है,
कोई कब तक संभाले खुद को इन रूश्वाईयो के साथ।

किसी शाखे गुलशन पर नहीं है बसेरा अपना ,
हम तो लिपटे है जड़ो में ही अपनी तनहइयो के साथ।

ये माना की सफ़र लम्बा है और अनजान है मंजिल,
चलने का हौसला है क़यामत तक अपनी परछाईयो के साथ ।

हर बिखरते सपने को संभाला है इन बोझल आँखों में,
उजाला लुट न ले सबकुछ सुबह की अंगड़ाईयो के साथ ।

अनजान शहर में पनपने का मतलब उखड जाना नहीं होता
हम बंधे है आज भी उसी शिद्दत से अपनी मिट्टी की गहराईयो के साथ 

Wednesday, August 22, 2012

जली ठूठ


जली ठूठ भी चीख रही है अश्क लिए  इन आँखों  में,   किस मजहब की ताशिर है बंद हुई इन सांसो में
ये क्यारी भी हरी भरी थी भोर पहर के पहले तक, इंसानियत और मानवता बिक गई सब दिन ढलने तक |
.
चिंगारी जब सुबह उठी थी कुछ ने मिट्टी डाली थी ,पर धर्म के ठेकोदारो की नियत ही कुछ काली थी
कुछ के सर पर चन्दन था और कुछ के सर पर टोपी थी ,पहनावे को छोड़कर उनकी सारी बातें ओछी थी |
.
चिंगारी को लपट बनाकर वो सारे बस निकल गए, आगे का मंजर मत पूछो पत्थर दिल भी दहल गए
कटे हुवे अब उन सरो का धर्म बताना मुश्किल था , कौन अब कितना तंगदिल और कौन किसका कातिल था|
.
कुछ लाशो  को कब्र मिली और कुछ को अग्नि ने लील लिया, मजहब के ही रहनुमाओ ने अपने धर्म का खून किया
जली ठूठ अब भी सुलग रही ,सोचे मानवता का भला कर जाये ,आग लगा सारे धर्मो को अपना जनम सफल कर जाये  |

Friday, August 10, 2012

दो महबूबा

मेरी दो महबूबा है यारो दोनो मुझको प्यारी हैं ,
एक से दुनिया रूठी रहती एक दुनिया को प्यारी हैं 

दोनो मुझसे पूछा करती किससे तेरी यारी है 
मैं म्यकस अक्सर यही कहता दोनो से याराना है |

कुछ दिन इसके संग मे रह लू फिर तेरे संग भी आना है
बहुत सोच कर किया फ़ैसला ,जीवन को स्वीकार किया |

उसकी याद भुला कर दिल से जी भर कर इससे प्यार किया
इसने मुझको खूब सताया कभी हंसाया कभी रुलाया |

कभी इज़्ज़त की चादर देती बीच सड़क पर कभी नचाया
थक हार कर जब चूर हुआ बेबस और मजबूर हुआ |
 .
फिर मौत को पास बुलाया यारी जोड़ी गले लगाया
आँखे भर कर उससे बोला तू भी मुझको प्यारी है
प्रियतम अपने संग मे ले चल अबकी तेरी बारी है

छोटी सी गुड़िया


कल ही देखा था उसको कुछ गुम्सुम सी कुछ खोई सी
वो कशिश नही थी चेहरे पे कुछ सूनापन कुछ रोई सी |

यू तो अक्सर बाते करती थी ,कुछ निस्छल सी कुछ अल्लहड़ सी
 मैं भी  सुनता था उसको ,कुछ भावुक सा कुछ आबूध सा |

एक हिम्मत की शायद कुछ पुछु, पर नीर दिखा उन आँखो मे
एक तिल भी हिल ना पाया मैं, वो ओझल हुई बस सांसो मे |

पिछे उसकी माँ थी शायद, कुछ तेज कदम कुछ चंचल सी
रौबदार और शालीन ,ममता के कुछ आँचल सी |

एक सुकून था उस चेहरे पे, जैसे उऋण होकर आई हो
कुछ दूरी थी उन रिश्तो मे, शायद सग़ी नही पराई हो |

क्या बात हुई होगी उसके संग ,सोचा था ये भोर पहर तक
मुर्दनी क्यों छाई थी उसपर, लकदक रहती थी जो कल तक |

अहली सुबह सुनने मे आया ,वो गर्भ गिरा कर आई थी
एक छोटी सी गुड़िया थी ,शायद जो उसकी ही परछाई थी.