भोर पहर के कोलाहल में उसने ,
डर कर सूरज को फिर देखा था।
उग आया था फिर पूरब से ,
विकराल और निर्मम होकर बिना किसी कोताही के ।
कुछ टूटी टहनी शाखों से बिखरी थी सुखी घासों पर ,
एक अलग सा रंग बिखरा था धरती की निर्मम छाती पर।
माघ में भादो की बारिश ने रबी की खेती को लील लिया,
बनिए के पलड़े ने भी कुछ इधर उधर का खेल किया ।
एक बिटिया है वो भी छोटी है दुधमुँहा एक बच्चा भी है,
साहूकार का कर्ज खतौनी वो भी पूरा कच्चा ही है।
पसीने से लथपथ रहती है चूल्हा करती वो बेचारी ,
दो बैल और एक कुत्ता गिनकर सात पेट की भूख हमारी ।
शहरों में भी कोलाहल है अखबार तो ऐसा कहते हैं ,
भूख की उनको पर नहीं चिंता वो तापमान से डरते हैं।
हर नेता भी चिंतित है संसद की ठंढी लाल दीवारो में,
सहानुभूति भी दे रखी है खम्भो पर लगे इस्तिहारो में।
किसानो की आफत को सबने सर पर अपने टांग लिया है ,
पत्र्कार और बुद्धजीवी ने भी अपने कॉलम में बाँग दिया है।
रोज एक मुर्दे का किस्सा अन्नदाता के नाम पर रहता है ,
अनुदान की राशि बट गई ये हर सरकारी बाबू कहता है ।
थाली सबकी ये भरते है यह किस्सा तो सब कहते हैं ,
पर सबके जूठन की कीमत पर भूखे पेट भी ये मरते है ।
किस पत्थर को पूजे अब और किससे ये मनुहार लगाये ,
या गलफांस लगाकर अब शांत शिथिल मृदुल हो जायें ।
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