Monday, July 20, 2015

किताब या धर्मग्रन्थ !


जो इंसानो की कदर करना भूल जाता है धर्म की रक्षा पर निकल पड़ता है ।जिस तरह गाय पालने वालो से ज्यादा गो रक्षा करने वाले हो गए है । फेसबुक और ट्विटर पर राष्ट्र्भक्त दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं लेकिन इनमे से सेना में कोई नहीं है ।अपनी छद्म राष्ट्रभक्ति और धार्मिकता को अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर एकदूसरे को निचा दिखाने का नया और सुलभ हथियार मिल गया है ।

हर सवाल के जवाब में इतिहास की कब्र खोद तथाकथित महापुरषो की अस्थियां दो मिनट में आपके दीवाल पर लटका दी जाएँगी ,अब इन्हे कोई ये क्यों नहीं समझाता की अस्थियां विसर्जित करने के लिए होती हैं वितरित करने के लिए नहीं |

इतिहास दफ़न करने के लिए लिखा जाता है कुछ सिखने के लिए नहीं ।इतिहास हमेशा युद्ध का ही क्यों लिखा जाता है ? ताकि आपको अगले युद्ध के लिए तैयार किया जा सके ? अगर इतिहास से सीखना होता तो द्धितीय  विश्वयुद्ध का नाम नहीं होता । हाँ उसी युद्ध को लड़ने के अलग तरीके जरूर ढूंढ लिए गए कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है तो कोई आतंकवाद के नाम पर। जो जीतेगा उसका इतिहास फिर लिखा जायेगा ।

जिस दिन इतिहास दफ़न करेंगे उस दिन इंसानियत के रास्ते का पहला कदम होगा वर्ना हर उस कदम को आपका इतिहास अपनी कब्र में खिचता रहेगा । सबकुछ साथ लेकर लुढ़कना आसान है पर चढ़ाई चढ़ने के लिए एक एक कर चीजो को छोड़ना पड़ता है । चुनाव तो आपका ही होगा अपने इतिहास की पोटली के साथ लुढ़कना है या अपने इतिहास के बोझ से हल्का होते हुए आगे चढ़ना है ।बस इतना ध्यान  रखियेगा की जितने बार अपने इतिहास के कब्र  में जायेंगे आपकी ऐतिहासिक पोटली और  भारी  होती जाएगी ।

दुनिया में लड़ाई कभी धार्मिक और अधार्मिक लोगो के बीच नहीं हुई है जब भी हुई है दो धर्मो के बीच हुई है ।  धार्मिक बनाना दुनिका का सबसे आसान काम है , बनिए धार्मिक पर एक किताब के साथ नहीं | अपने धर्म की किताब बदलते रहिये जब पिछले 1000 सालो में सबका पहनावा बदल गया ,खान पान बदल गया ,रहने से लेकर आने जाने का तरीका बदल गया, यहाँ तक की भाषा बदल गई हर 10 सालो में स्कूल कॉलेज का सीलेबस बदल जाता है पर सबके अपने अपने धर्म की किताब कभी नहीं बदली ।

ऐसा लगता है की उस आखरी लेखक की मौत के बाद कोई उससे अच्छा लेखक आज तक पैदा ही नहीं हुआ |  अच्छा है , नहीं बदलना चाहते है तो एक दूसरे से एक्सचेंज कर लीजिये , हो सकता है आपको अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का तरीका मिल जाये ।

किसी पर सवाल करना उसका अपमान करना नहीं होता बल्कि उसके साथ अपनी सहमति बनाने की कोशिश होती है फिर धर्म पर सवाल करने के नाम पर सारे असहज क्यों महसूस करने लगते है । क्यों धर्म की रक्षा के नाम पर तलवार की जरुरत होती है ? और क्यों रक्षा की जरुरत भी है ? क्यों कोई धर्म खुद के आडम्बरो से असहमत होने की इजाजत नहीं देता ? दो धर्मो को जब आपस में लड़ने का मौका नहीं मिलता तो एक ही धर्म में कई गुट हो जाते है फिर वो आपस में लड़ने लग जाते है ।

धर्म छोड़ना थोड़ा मुश्किल काम है इसके लिए आपको सारे भुत और भगवान के भय से मुक्त होना पड़ता है अपनी धार्मिक सोच से मुक्त होना पड़ता है । धर्मग्रन्थ को किताब समझ कर पढ़ना पड़ता है पूजनीय समझ कर नहीं , उसपर सवाल करने पड़ते है। कोई धर्म लेकर पैदा नहीं होता बल्कि पैदा होने के बाद धर्म चिपकाया जाता है और फिर उसे उखाड़ना बड़ा मुश्किल होता है ।धर्म छोड़ने का मतलब ये नहीं एक को त्याग कर दूसरे को अपना लिया, ये तो बस इस नाव से उस नाव में बैठने जैसा है । धर्म छोड़ने का मतलब खुद तैरना सीखना है किसी नाव की सवारी नहीं।

धार्मिक नहीं होना मतलब अधार्मिक नहीं होता ,हालांकि अधार्मिक जैसा शब्द भी धार्मिक लोगो ने ही ईजाद किया है ।  धार्मिक होना भी बुरा नहीं है पर अपने अपने धर्म की किताब हर 10  सालो में आपस में बदल लिया कीजिये ठीक उसी तरह जैसे स्कूलों सीलेबस बदल जाता है । या फिर इस झंझट से अच्छा है अधार्मिक हो जाइये और किताबो को किताब की तरह पढ़िए धर्मग्रन्थ की तरह नहीं । शायद एक दूसरे को धार्मिक पहचान के साथ नहीं उसकी पहचान से देखना सिख सकते है ।




Monday, June 8, 2015

Little किसान


भोर पहर के कोलाहल में उसने ,
डर कर सूरज को फिर देखा था।
उग आया था फिर पूरब से ,
विकराल और निर्मम होकर बिना किसी कोताही के ।

कुछ टूटी टहनी शाखों से बिखरी थी सुखी घासों पर ,
एक अलग सा रंग बिखरा था धरती की निर्मम छाती पर।
माघ में भादो की बारिश ने रबी की खेती को लील लिया, 
बनिए के पलड़े ने भी कुछ इधर उधर का खेल किया । 


एक बिटिया है वो भी छोटी है दुधमुँहा एक बच्चा भी है,
साहूकार का कर्ज खतौनी वो भी पूरा कच्चा ही है।
पसीने से लथपथ रहती है चूल्हा करती वो बेचारी ,
दो बैल और एक कुत्ता गिनकर सात पेट की भूख हमारी ।


शहरों में भी कोलाहल है अखबार तो ऐसा कहते हैं ,
भूख की उनको पर नहीं चिंता वो तापमान से डरते हैं।
हर नेता भी चिंतित है संसद की ठंढी लाल दीवारो में,
सहानुभूति भी दे रखी है खम्भो पर लगे इस्तिहारो में।

 
किसानो की आफत को सबने सर पर अपने टांग लिया है ,
पत्र्कार और बुद्धजीवी ने भी अपने कॉलम में बाँग दिया है।
रोज एक मुर्दे का किस्सा अन्नदाता के नाम पर रहता है ,
अनुदान की राशि बट गई ये हर सरकारी बाबू कहता है ।

थाली सबकी ये भरते है यह किस्सा तो सब कहते हैं ,
पर सबके जूठन की कीमत पर भूखे पेट भी ये मरते है ।
किस पत्थर को पूजे अब और किससे ये मनुहार लगाये  ,
या गलफांस लगाकर अब शांत शिथिल मृदुल हो जायें ।