कुछ मेरा भी
Sunday, October 4, 2026
पेड़ की ख्वाहिश
Saturday, October 3, 2026
मैं कैसे बन जाऊँ राम
मैं कैसे बन जाऊँ राम
कोई मुझको बस ये समझा दे, मैं कैसे बन जाऊँ राम
सूर्पनखा की नाक मैं काटूँ या बाली के हर लूँ प्राण
रावण के मैं दस सर काटूँ या मारुं नाभि में बाण
स्वर्ण मृग का मोह न त्यागु राजपाट के पीछे भागूं
अपने ही बच्चों का वर्षो तक न लूँ मैं कोई भी भान
कोई मुझको बस ये समझा दे मैं कैसे बन जाऊँ राम
सीता को अग्नि में डालूं या फिर उसका मै त्याग करूँ
सबरी का जूठा भी खाऊं और शम्बूक का संहार करूँ
जाति कूल और वर्ण वयवस्था का मन में विद्वेष भरूँ
वाल्मीकि की कथा पढूं या गाउँ, तुलसी रचित वो गान
कोई मुझको बस ये समझा दे मैं कैसे बन जाऊँ राम
दुनिया मुझको राम की भक्ति कुछ आकर ऐसे समझाए
मै अबोध सा सुनता जाऊं बस एक सवाल मन में दोहराये
राम विष्णु है राम ही कृष्णा, राम मिथ्या है राम ही तृष्णा
राम क्रोध है राम क्षमा है, राम ममता है राम ही माँ है
राम दर्द है राम ही सुख, राम है तृप्ति राम ही भूख
राम अल्ला है राम ही ईश्वर, राम अमर है राम ही नश्वर
राम आदि है राम अनंत, राम है साधु राम ही संत
राम नीर है राम है अग्नि, राम माया है राम ही ठगनी
राम मंदिर है राम ही पूजा, राम के जैसा और न दूजा
पर मेरी आँखों के आगे राम के नाम पर लूटती जान
कोई मुझको बस ये समझा दे मैं कैसे बन जाऊँ राम
आधे अधूरे
आधे अधूरे
कुछ बातें आधी ही अच्छी
उनको आधा ही रहने दो
तुम आधी अपनी कह लेना
मुझको अपना आधा कहने दो |
वो आधी नींद के आधे सपने
आधी रात की आधी बातें
सबकुछ आधा ही बेहतर है
तेरी खुशियों के आधे दिन
मेरे गम की आधी रातें |
कितना सुन्दर लगता है वो
आसमान का आधा चाँद
राही का वो आधा गाँव
और तेरी आधी भरी हुई मॉँग |
पुरा गर मिल जाये जिस दिन
मै सुना बेरंग हो जाऊंगा
आधा पाकर आधा पाने को
लौट लौट फिर आऊंगा |
Monday, October 2, 2023
गांधी तुम चौकन्ने रहना !
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे
दिल मे नफरत की आंधी रख झुक झुक फुल चढ़ाएँगे
इनके मन की कुंठा को तुम तो खूब समझते हो
गोली खाकर भी इनकी तुम रत्ती भर ना लरजते हो
तेरी लाठी लेकर तुमसे अपना हथियार बनायेगे
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे |
धर्म ध्वज की बात करेंगे और तिरंगे का अपमान
पर इनकी मजबूरी देखो छीन ना सकते तेरा मान
क्षमा दया और प्यार की बंसी तुम तो खूब बजाते थे
पर उस दौर में भी ये नफरत की आग लगाते थे
इतिहास की बेदि पर बैठे ये उसीकी धुनि जलाएंगे
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे |
क्रूर क्रोधी और कामहीन ये प्यार की भाषा क्या जाने
आत्ममुग्ध और आत्मप्रवंचित नीरसता को जीवन माने
सत्ता की चाहत मे जब ये धर्म के ठेकेदार बने
हिन्दू मुस्लिम करते करते चोर से चौकीदार बने
अब सत्ता के ठेले पर हर ओर नफरत बिकवायेंगे
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे |
दोष भी इनको क्या दे जब ये सोच ना अपनी गढ़ पाये
एक सदी के बाद भी जब ये देश की नब्ज न पढ़ पाये
इस देश का दिल ही सतरंगी है एक न भाषा एक न बोली
नानक और युसू भी मिलकर ईद मनायें और खेले होली
देशभक्ति की आड़ में ये हर ओर नफरत फैलाएंगे
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंग |
सच तो ये है बापू तुमसे आज भी खूब ये डरते हैं
जितने फूल चढ़ाते उससे दुगनी नफरत करते है
मंदिर मस्जिद को इन्होने अपना हथियार बनाया है
इस देश को इन्होने बस नफरत करना सिखाया है
अपनी नफरत की भट्टी मे ये खुद ही जल मर जायेंगे
गांधी तुम चौकन्ने रहना तेरे गुण ये गायेंगे |
दिल मे नफरत की आंधी रख झुक झुक फुल चढ़ाएँगे।
Wednesday, August 18, 2021
आहट
जब बिना रीढ़ के अखबारों में राजा की बात हीं छपती हो,
जब कलम करे कोताही और खबरों की हेराफेरी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
जब भेड़चाल में सारी भेड़े ऊँचे स्वर में हुंकार भरे,
जब लाखों मौतों पर भी न कोई शासन का प्रतिकार करे ,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
जब धर्म का चोला ओढ़े कोई साधु बड़ा व्यापारी हो,
जब मठ का कोई मठाधीश शासन में सत्ताधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
जब अनपढ़ अवसरवादी राजा सिर्फ भूतकाल में बात करे,
और वर्तमान की चौखट पर भविष्य के साथ भी घात करे,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
जब मंदिर मस्जिद के मुद्दों पर सत्ता की दावेदारी हो,
जब सफेदपोशो के मंचो पर कोई टोपी या भगवाधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
जब केसरिया और हरा रंग अलग अलग लहराते हों,
छत की मुंडेरों से लटके अपनी मज़हबी पहचान बताते हों,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |
Wednesday, October 2, 2019
2 अक्टूबर
तुम लाठी लेकर चलते रहना हम बम गोले मरवाएँगे,
भय भूख से घिसट घिसट कर आना तुम चौराहे पर
केसरिया और हरा दिखा कर नारे तुमसे लगवाएँगे।
लोकतंत्र और लोकाचार दफ़न कर देना क़ब्रों में
और अपनी अपनी बस्ती को मजहबी मुंडो से भरना
एक रंग का साफ़ा बांधे दूजे रंग से नफ़रत करना,
मेरी अन्ध्भक्ति में बौद्धिकता जब घुटनो तक आजाएगी
ग़ैर मजहबी मानव तन की लिंचिंग तुमसे करवाएँगे ।
ख़बरों में लिपटा रंग बिरंगी एक काग़ज़ का चीथड़ा आता है
उन ख़बरें बूनने वालों से हम अपनी लीला लिखवाएँगे
चित्रहार और रंगोली का जो बुद्धू बक्सा आया था घर में
उसी बक्से पर हम तुमको अपना जलवा दिखलाएँगे ।
इतिहास का जो सबक़ तुम्हारे पुरख़ो ने बतलाया था
उस इतिहास की भारी अर्थी हम तुमसे ही उठवाएँगे
तुम तोता बनकर पढ़ते रहना हम अपना इतिहास पढ़ाएँगे ।
तुम नौकरी नौकरी गाते रहना हम देशभक्ति समझाएँगे
तुम हाथ पसारे बैठे रहना हम सब्ज़बाग़ दिखलाएँगे
तुम चीख़ मरना अस्पताल में हम बीमा करवाएँगे
चुनाव जब फिर आएगा हम पाक से लड़ने जाएँगे।
इस नारे से नये भारत का नया नक़्शा बनवाएँगे ।
Wednesday, January 11, 2017
थोड़ी दूर
खूब सहेजा था वर्षो तक ,वो यादें जाने किधर गई ,
कुछ यारो की भी यारी थी ,जो प्यालो में घुल कर बिखर गई ।
कुछ तेरा था जो ले आया मैं ,कुछ मेरा था जो छोड़ दिया ,
कुछ कसमे वादे भी लाया था ,उन सबको कब का तोड़ दिया ।
एक घड़ा था रिश्तो का जो ,भरकर भी खाली रहता था ,
आज उन्ही कुछ नए रिश्तो में ,खालीपन से भर जाता हूँ ।
कल होगा बेहतर कुछ अपना ,पर कितने आज गवाऊंगा ,
जो बिखर रहा है रोज निरंतर वो किस किस को बतलाऊंगा ।
ये माना जीना आसां है ,पर सूनापन तन्हाई है ,
दिनभर बातें करता हूँ जिससे ,वो मेरी ही परछाईं है ।
एकांत मेरा प्यारा है मुझको ,पर इतना भी ना की निर्जन हो ,
एक छोटी सी बगिया हो अपनी , उसमे थोड़ा सा सावन हो ।
