Friday, April 1, 2016

दिल्ली मेट्रो और उसका साम्यवाद


साम्यवाद और सहिष्णुता का जीवंत उदहारण देखना हो तो दिल्ली मेट्रो की सवारी कीजिये एकदम सहिष्णु और उदारवादी समतामूलक समाज जिसकी कल्पना कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने भी नहीं की होगी। उम्र,धर्म,जाति,लिवास,पेशा और हैसियत इन सबका चूरमा बनकर एक शब्द बनता है "यात्रीगण"।अलग अलग उम्र , धर्म और जाति के गण अपने अलग अलग लिवास में अपने पेशे के प्रति निष्ठा को मजबूत करते हुए अपनी हैसियत के हिसाब से मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते ही मेट्रो के पेट में समाने के लिए बेचैन दिखने लगते हैं यहाँ इन सब की एक ही पहचान होती है "यात्रीगण"। हुड्डा सिटी सेंटर से साकेत तक आने में ऐसा लगता है मेट्रो अपने गर्भावस्था का एक चरण पुरा करती है।

शाम के 6 बजे हुड्डा से MG रोड तक आते आते मेट्रो के डिब्बों का पेट पूरा फुल जाता है एकदम ठस, क़ुतुब मीनार आते आते  crawilling शुरू हो जाती है और साकेत आ कर ऐसा लगता है डिलीवरी हो गई , लोग फिसल कर सबसे पहले कार्ड लगाकर निकलने की होड़ में ऐसे भागते हैं जैसे अब दुबारा लौट कर नहीं आने वाले ,पर फिर सुबह होते ही जिस तेजी के साथ फिर प्रवेश करते हैं तो लगता है जैसे इन 12,13 घंटे की विरह बड़ी मुश्किल से गुजारी है।ठीक यही नजारा नोएडा सिटी सेंटर से राजीव चौक के बिच होता है।पर इनसबके बीच जो सबसे अच्छी बात होती है वो है अनुशासन।स्वनियंत्रित और स्वअनुशासित लोगो की भीड़ एक दूसरे से बिना कोई भेद भाव और बिना किसी परेशानी के बस चलती रहती है।सब व्यस्त हैं अपने अपने स्मार्टफोन के साथ, कान में हेडफोन लगाए हुए ,बिना एक दूसरे से बात किये हुए ,इनमे कुछ ही मेरे जैसे असमाजिक होंगे जो इस सब को किसी नजरिए से देखते होंगे ।

बाकि किसी भी यातायात के माध्यम में आप साथ चल रहे लोगो को उनके एकदूसरे से रिश्ते की पहचान कर सकते हैं पर मेट्रो में रिश्ते पहचानना मुश्किल है।अरे जनाब अनुशासन का ऐसा नजारा आपको मिल ही नहीं सकता की बीवियाँ भी बिना कुछ बोले पूरी यात्रा कर लेती है, कुछ अपवाद हर जगह होते हैं पर बीवियों को ऐसा अनुशासन सिखाने का काम अगर कोई कर सकता है तो इससे नायाब चीज आपको शायद ही देखने को मिले ।

हर स्टेशन का अपना अलग नजारा है जैसे साकेत के बाहर चबूतरे पर एक लाइन में बैठे लोगो का कारण आज तक नहीं समझ पाया आखिर किसके इंतजार में बैठे है।वहीं रेसकोर्स और जोरबाग स्टेशन देख कर लगता है यहाँ से कोई उतरता चढ़ता भी है या नहीं ? अगर कमाई के हिसाब से तन्खाह बटने लगे तो यहाँ के कर्मचारी को सुबह शाम की चाय मिल जाये वही बहुत है बाकि रोटी का खर्चा केंद्रीय सचिवालय स्टेशन से लेना पड़ेगा।राजीव चौक के कर्मचारी तो दुबई से एमिरेट्स का डेली पैसेंजर  पास बनाकर नौकरी कर रोज वापस दुबई जा सकते हैं।पर हाँ फिर भी कुछ बदलाव की जरुरत अभी भी है दिल्ली मेट्रो को बेहतर बनाने में।

⇛ मसलन, चढ़ने के लिए एस्केलेटर लगे हैं और उतरने के लिए सीढ़ियाँ मगर सीढ़ियों पर जिस कदर का सन्नाटा पसरा रहता है वहां गद्देदार स्लाइडर लगा देना चाहिए ।

⇛ बिना बेंच वाले डब्बे लगाने चाहिए ताकि सब खड़े होकर ही यात्रा करे इसके बिना मेट्रो के अंदर सम्पूर्ण साम्यवाद की कल्पना मुश्किल है वरना शुरुवात स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुलने के बाद लोग ऐसे दौड़ते है जैसे बाड़ा तोड़ कर भागी भैंस।सबको कुचलते मसलते हुए जिसको वृद्ध और महिलाओं की सीट छोड़कर सीट मिल गई उसके चेहरे का सुकून देखते बनता है ।
 
⇛ मेट्रो में खड़े हुए अपनी यात्रा के दौरान योग कैसे करे इसके निर्देश लगा देने चाहिए । मसलन अगर आपको बैठने की जगह न मिले तो दोनों हाथो से दो लटके हुए हैंडल को पकड़ कर तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें।इससे ज्यादा से ज्यादा शुद्ध हवा आपके फेफड़ों में जाएगी क्योकि मेट्रो से बहार निकलते ही फिर आपका सामना Ph level से होना होता है ।

⇛  सांसो पर नियंत्रण करने के लिए अपने सांसो को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बिच के अनाउंसमेंट के बिच रोक कर रखे ।शुरुवात छोटी दुरी के स्टेशन से करे ।

वैधनिक चेतवानी : गुड़गावं जाने वाले अर्जनगढ़ से गुरु द्रोणाचार्य के बीच श्वास नियंत्रण न करे वरना आपकी सांसे उखड सकती हैं ।

आप भी अपने सुझाव जोड़ सकते हैं ।कार छोडिए और मेट्रो के साथ साम्यवाद फैलाइये । 

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