Monday, February 18, 2013

साहेब सटल और दामिनी


दिसम्बर के महीने में धुंवे, धूल और धुंध से लिपटे हुए आंकड़ो में बड़ी तेजी से उभरते हुए बिहार की राजधानी पटना के  रेलवे स्टेशन का भोपा अचानक से चीखा "यात्रीगण कृपया ध्यान दे इस्लामपुर पटना बक्सर पैसेंजर ट्रेन 6 नंबर पर आ रही है "| यात्रियों का रेला अपने अपने कंधे पर बोझ लटकाए एक दुसरे के प्रतिस्पर्धी बने 4 से 6 नंबर प्लेटफार्म की ओर कूच करने लगा, जो अब तक बोर्ड पर लिखे सूचना के आधार पर 4 नंबर पर जमावड़ा लगाये हुए था । सबको जल्दी है घर पहुचने की और उससे ज्यादा अपने दिनभर की भाग दौड़ से बेदुम हुए टांगो को सहारा देने के लिये एक आसन की जो शायद किसी रेलमंत्री की कृपा से पटरी से गद्देदार सकल ले चुका है । इस ट्रेन का भी अपना एक गौरान्वित इतिहास और वर्तमान दोनों है । इस्लामपुर पटना बक्सर पैसेंजर उर्फ़ "साहेब सटल" पटना से आरा तक इसे राजधानी एक्सप्रेस से उपर का दर्जा प्राप्त है , मजाल नहीं किसी ट्रेन की जो इसे रोककर आगे निकल जाये ।

जितनी सवारी पटना राजधानी एक हफ्ते में ढोती है उतनी ये अपने एक फेरे में । इस ट्रेन के महिमामंडन से मेरा कोई खास संदर्भ नहीं है परन्तु चर्चा जरुरी लगी अमूनन ये एक डेली पैसेंजर ट्रेन है कामकाजी लोगो के लिए और इसमें यात्रा करना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव है । बेशक आपको कही से कोई सहुलियत न हो फिर भी अगर आप किसी क्षेत्र के सामजिक परिवेश और लोगो के सोचने के तरीके के बारे में जानने की उत्सुकता रखते है तो लोकल पैसेंजर ट्रेन एक बेहतरीन जरिया है ।उसी जरिये में मै भी सवार हुआ पटना से आरा तक की यात्रा के लिए बिना किसी जल्दबाजी के लोगो की रेलमपेल ख़तम होने के बाद । सबकी अपनी अपनी सीटो की दावेदारी खिड़की के रास्ते रखे रुमाल टोपी और मफलर के पहचान के साथ चिन्हित हो रही थी। मै भाग्यशाली रहा की थोड़ी देर खड़े रहने के बाद एक युवा ने अपने सामने की सीट पर मुझे आमंत्रित किया जिसपर काफी देर से उसने अपना बैग रखा था । "एक दोस्त का इंतजार कर रहा था आया नहीं आप बैठ जाओ " शायद हमउम्र का आर्कषण रहा हो । इस ट्रेन में आपको बिना किसी नेता की अगुआई के अपनी अपनी पार्टी और नेता की दलीलों के साथ सफ़र करने वाला समाज मिलेगा । नेता और इलीट इस ट्रेन में सफ़र नहीं करते वो गरीब रथ ,पूर्वा एक्सप्रेस और मगध एक्सप्रेस के एसी डब्बो में बिना टिकट की लोकल यात्राये करते है और उनका समाज MST पास के साथ साहेब सटल में ।

लोगो के आपस में बातचीत से आप उनके पेशे और उनकी गंभीरता का अंदाजा लगा सकते है । मेरे इर्दगिर्द कुछ सचिवालय कुछ बैंक और कुछ कॉन्ट्रैक्ट शिक्षको का समुह था जिसमे 7 , 8 शिक्षकाए भी थीं । कॉन्ट्रैक्ट टीचर की बिहार में चाहे जितनी शिकायत हो पर इसमें मै एक सकारात्मक पहलु हमेशा देखता हूँ । इसने महिलाओ को अपनी दावेदारी इस पित्रसतात्मक समाज में थोड़ी धमक के साथ रखने का मौका दिया है । सब अपने अपने समूह में बंटे अपनी अपनी अलग चर्चा में लगे हुए थे । कॉन्ट्रैक्ट टीचर के समूह में कुछ की चर्चा उनके काम के जगह ,वेतन,और रोज इस ट्रेन से अनजाने की कवायद से हट कर प्रभारी के साथ अपने CL और PL की छुट्टियों के विवाद पर केन्द्रित हो गई । यह एक व्यापक समस्या है हिंदुस्तान में हर वरीय अपने कनीय कर्मचारी की छुटियो पर अपनी सहमती की मुहर लगाने के एवज में अपने एहसान और परोपकार की स्याही जरूर पोतता है चाहे वो सरकारी दफ्तर हो या MNC का वातानुकूलित प्रांगन । इन शिक्षकाओ के समूह से एक महिला अपने एंड्राइड मोबाइल की स्क्रीन पर किसी सिनेमा का लुफ्त अपने दो और सहयोगी शिक्षका के साथ उठा रही थी जो वहां बैठे हर शख्स को नागवार गुजर रहा था ।

तभी से किसी ने व्यंग किया "नितीश का राज है भाई क्या कीजियेगा " मगर उस महिला के त्वरित सवाल "कौन बोला" ने उन सज्जन को अपनी पहचान छुपाने पर मजबूर कर दिया , लेकिन उस महिला का सवाल "कौन बोला" दो तीन बार लगातार उस गुमनाम आवाज को तलाशता रहा अपने उसी दृढ़ता के साथ । उत्तर ना पाकर उस महिला की सहयोगी ने उसे चुप कराया "छोडो जाने दो समाज बोला किस किस से लड़ोगी "
त्वरित उत्तर "मै अपना मनोरंजन कैसे करती हूँ ये मेरी पसंद है समाज को परेशानी है तो बोलो अपने घर में रहे " और फिर से मशगुल हो गई । थोड़ी देर तो शांति रही लेकिन सबके दिल में उसी की बात उथल पुथल मचा रही थी इसका अंदाजा मुझे भी था । अब इसी समाज में खड़े पुरुष जत्थे ने दिल्ली में हुए बलात्कार की चर्चा शुरू कर दी जो मेरे ध्यानाकर्षण की प्राथमिकता बन गई।

अभी अभी आया था दिल्ली के उस दर्द को इंडिया गेट पर मोमबती की शक्ल में जलते हुए , पानी के बाछौर के बिच उबलते हुए और पुलिस की लाठियों के बिच तड़पते हुए देखकर । दिल्ली से दूर बैठा समाज इस घटना के पुरे परिवेश पर क्या सोच रखता है शायद ये जानने की उत्सुकता रही हो । अब ये चर्चा अनायास ही समय काटने की थी या उस महिला को इस चर्चा से अपने पुरुषत्व का अहसास कराने की थी इसका अंदाजा लगा नहीं पाया या शायद लगाना नहीं चाहता था क्योंकी इस चर्चा में बहुत लोगो ने उत्सुकता जाहिर कर दी थी । अब बात बलात्कार से उठ कर पहनावे की निर्लजता और समय की पाबंदीयो पर आ चुकी थी । सब दिल्ली के अपने अनुभव को अपने तरीके से नमक मिर्च के साथ परोसने लगे की कैसे दिल्ली की लड़कियां रात के 1 बजे  तक घुमती है और कितने की बियर एक बार में पी जाती हैं इसमें सबसे उच्चतम आंकड़ा 2400 का रहा ,जो एक सज्जन ने कहा की एक लड़की 2400 का बियर एक बार में पी गई ये उसी को देखकर बियर बार में गए थे तो पता चला 1 बियर 400 रुपये की है तो वापस लौट आये । तब तक ट्रेन नेउरा स्टेशन पहुच चुकी थी और "कौन बोला" सवाल के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली महिला भी अपना मनोरंजन स्थगित कर इनकी चर्चा में दिलचस्पी लेने लगी थी इसका पता तब चला जब कुछ सवालो के साथ उसने अपना विरोध दर्ज कराया ।


आपको लडकियों के बियर पिने पर आपति क्यों है ?
लड़की बियर बार में नाच सकती है तो पी क्यों नहीं सकती ?
आप देखने गए थे की उस लड़की ने क्या पहन था की बलात्कार हो गया ?


कम से कम 3 मिनट तक निर्वघन एकाकी संवाद बिना किसी जवाब का इंतजार किये चलता रहा ,शायद उस महिला ने इस पुरे सन्दर्भ में उस दामिनी में अपना अक्स देख लिया था और इन तमाम मर्दों की गन्दी निगाहों से बचाने की जद्दोजहद में जूझती नजर आने लगी । थोड़ी बहुत आपत्ति और अनापत्ति के दौर के बाद फिर से कुछ देर की ख़ामोशी पसर गई इस सवाल के साथ की "ट्रेन कहा पहुची ?" । धुंध ने वैसे भी ट्रेन की रफ़्तार पर कब्ज़ा जमाया हुआ था । सारे फिर से अपने अपने बिना विवाद की चर्चा के विषय तलाशने लगे पर इन सबके बिच उस मुखर महिला के औरत होने का भय भी मै देख पा रहा था जो हर दुसरे मिनट पर अब किसी को फ़ोन कर ट्रेन के थोड़ी देर में जमीरा हाल्ट पहुचने की सुचना दे रहा था । जो उसके अपने विरोध के तरीके या सात बजे शाम में धुंध और अँधेरे से घिरे जमीरा हाल्ट प्लेटफार्म से उसके घर की दुरी के कारण भी हो सकता था । साथ में ये भी सबको सूचित करते हुए की "मै किसी से डरती नहीं हूँ एक मिस्ड कॉल से मेरे सारे भाई और चाचा 1 मिनट में स्टेशन पर आ जाते हैं " । उसका डर अपने सुरक्षा का ताना बाना भी बुन रहा था ।जमीरा हाल्ट के बाद आरा स्टेशन पड़ता है जहाँ के बाद इसी साहेब सटल की बादशाहत को चुनौती देती तमाम ट्रेने इससे आगे निकलने लगती हैं , ट्रेन भी अमूनन खाली हो जाती है । ट्रेन से उतरते हुए मै उस जमीरा हाल्ट की महिला , दिल्ली की दामिनी और हमारे समाज के बलात्कारी होने अथवा हो जाने की मानसिकता की दलीलों में खोया हुआ अपने घर की तरफ बढता रहा | इस सोच के साथ की दामिनी के चले जाने का गम सिर्फ इंडिया गेट पर जमा हुए लोग ही नहीं पाल रहे हैं , बल्कि दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर जमीरा हाल्ट की एक "Contract Teacher" जो रोज शायद पटना के आसपास पढ़ाने जाती है उसके दिल में भी सुलग रहा है ।

















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