Tuesday, November 22, 2016

I am a Progressive Patriot


इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में मृतक संख्या बढ़कर 146 हो गई है।  मृतकों में से 110 लोगों की पहचान की जा चुकी है और 97 शव परिजनों को सौंप दिए गए हैं।

सब चुप हैं, कोई सवाल नहीं कोई सफाई नहीं , मुआवजा बटने लगा है जाँच कमेटी बना दी गई है ।

अजी ये भी मरना कोई मरना है , कौन लेगा इसकी जिम्मेवारी , ऐसी मौत से किसी के खून में उबाल आता है भला ? ये तो हमारे ही लोग हैं हम जैसे चाहे मार दे ट्रैन में मार दे या पूल गिरा कर । भूखो मार दे या शराब पिला कर । यात्री थे, यात्रा पर ही थे ,जहाँ उतरना था वहाँ से थोड़ा आगे चले गए । कोई बॉर्डर पर खड़े थोड़ी न थे की देशभक्त या शहीद का दर्ज दे दिया जाये , ट्रैन में भला कोई देशभक्त होता है ?  देशभक्त या तो बॉर्डर पर रहता है या Facebook  और Twitter पर । जबतक  बॉर्डर के आस पास आपकी छाती में पाकिस्तान का बुलेट न लगे आपको देशभक्त कैसे माना जायेगा ।

यद् रहे हमारा खून तभी ख़ौलता है जब पाकिस्तान की बॉर्डर पर कोई मरता है नेपाल बर्मा या भूटान पर नहीं , बाकि आपकी मर्जी आप जहाँ मर जाओ ट्रैन में मरो या अस्पताल में , दारू पि कर मरो या बिना पिए ही मर जाओ।  दंगो में मरो या दर्शन में, मंदिर के लाइन में मरो या ATM की लाइन में ,हिंदुस्तान में बनी गोली से मरो  या किसी तलवार से काट दिए जाओ । बड़ा सवाल ये है की मरे कैसे ? सड़क दुर्घटना का शिकार हुए ? ट्रैन हादसे में मर गए ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? कितने मरे?........ 150 बस !



पता करो मुआवजा बट गया  न। ... बेचारे कितने दिनों से इस मुआवजे का इंतजार कर रहे थे मनोकामना अब पूरी हुई। जो बच गए वो अफ़सोस मना रहे हैं। कोई बात नहीं फिर से टिकट लेना यात्रा करना फिर किसी दिन संयोग होगा। इसी रेलगाड़ी के बारे में सोचते रहे तो बुलेट ट्रैन कैसे लाएंगे। हमारे नेता हाइवे पर जेट touchdown करवा रहें है आप लोग रेल का रोना रोते  रहोगे ।  You Know ....... There is a word called "Progressive Patriot" and you just don't know it. ... and therefore, both literally and figuratively you unable to see the big picture. 



हम स्मार्ट सिटी बनाएंगे अब जिस सिटी में आप साँस नहीं ले पा रहे हो उसपर टाइम क्यों ख़राब करे । हम बुलेट ट्रैन चलाएंगे स्काई ट्रैन चलाएंगे ये अंग्रेजो की बनाई रेल लाइन पर अपना हुनर क्यों बर्बाद करे ।
अब तो हम जापान और चीन की सहायता ले ले कर जापान और चीन से आगे निकलने की राह पर हैं । Opss.. sorry चीन नहीं , चीन के झालर का तो अभी बहिस्कार किया था, आगे सोचा जायेगा फिलहाल नहीं ।

फिलहाल तो गिनिये कितने मरे, कौन गया, कौन नहीं गया, किसने कितना बांटा ,किसने नहीं बांटा । किसके शासन में कितनी पलटी और कितने मरे।

और हाँ सबसे जरूरी बात ट्रैन दुर्घटना में मरने वालो का धर्म और जाति नहीं देखी जाती  , तो उसकी अभी कोई जरूरत  तो नहीं है अगली बार से देखेंगे  -----------




Friday, April 1, 2016

दिल्ली मेट्रो और उसका साम्यवाद


साम्यवाद और सहिष्णुता का जीवंत उदहारण देखना हो तो दिल्ली मेट्रो की सवारी कीजिये एकदम सहिष्णु और उदारवादी समतामूलक समाज जिसकी कल्पना कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने भी नहीं की होगी। उम्र,धर्म,जाति,लिवास,पेशा और हैसियत इन सबका चूरमा बनकर एक शब्द बनता है "यात्रीगण"।अलग अलग उम्र , धर्म और जाति के गण अपने अलग अलग लिवास में अपने पेशे के प्रति निष्ठा को मजबूत करते हुए अपनी हैसियत के हिसाब से मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते ही मेट्रो के पेट में समाने के लिए बेचैन दिखने लगते हैं यहाँ इन सब की एक ही पहचान होती है "यात्रीगण"। हुड्डा सिटी सेंटर से साकेत तक आने में ऐसा लगता है मेट्रो अपने गर्भावस्था का एक चरण पुरा करती है।

शाम के 6 बजे हुड्डा से MG रोड तक आते आते मेट्रो के डिब्बों का पेट पूरा फुल जाता है एकदम ठस, क़ुतुब मीनार आते आते  crawilling शुरू हो जाती है और साकेत आ कर ऐसा लगता है डिलीवरी हो गई , लोग फिसल कर सबसे पहले कार्ड लगाकर निकलने की होड़ में ऐसे भागते हैं जैसे अब दुबारा लौट कर नहीं आने वाले ,पर फिर सुबह होते ही जिस तेजी के साथ फिर प्रवेश करते हैं तो लगता है जैसे इन 12,13 घंटे की विरह बड़ी मुश्किल से गुजारी है।ठीक यही नजारा नोएडा सिटी सेंटर से राजीव चौक के बिच होता है।पर इनसबके बीच जो सबसे अच्छी बात होती है वो है अनुशासन।स्वनियंत्रित और स्वअनुशासित लोगो की भीड़ एक दूसरे से बिना कोई भेद भाव और बिना किसी परेशानी के बस चलती रहती है।सब व्यस्त हैं अपने अपने स्मार्टफोन के साथ, कान में हेडफोन लगाए हुए ,बिना एक दूसरे से बात किये हुए ,इनमे कुछ ही मेरे जैसे असमाजिक होंगे जो इस सब को किसी नजरिए से देखते होंगे ।

बाकि किसी भी यातायात के माध्यम में आप साथ चल रहे लोगो को उनके एकदूसरे से रिश्ते की पहचान कर सकते हैं पर मेट्रो में रिश्ते पहचानना मुश्किल है।अरे जनाब अनुशासन का ऐसा नजारा आपको मिल ही नहीं सकता की बीवियाँ भी बिना कुछ बोले पूरी यात्रा कर लेती है, कुछ अपवाद हर जगह होते हैं पर बीवियों को ऐसा अनुशासन सिखाने का काम अगर कोई कर सकता है तो इससे नायाब चीज आपको शायद ही देखने को मिले ।

हर स्टेशन का अपना अलग नजारा है जैसे साकेत के बाहर चबूतरे पर एक लाइन में बैठे लोगो का कारण आज तक नहीं समझ पाया आखिर किसके इंतजार में बैठे है।वहीं रेसकोर्स और जोरबाग स्टेशन देख कर लगता है यहाँ से कोई उतरता चढ़ता भी है या नहीं ? अगर कमाई के हिसाब से तन्खाह बटने लगे तो यहाँ के कर्मचारी को सुबह शाम की चाय मिल जाये वही बहुत है बाकि रोटी का खर्चा केंद्रीय सचिवालय स्टेशन से लेना पड़ेगा।राजीव चौक के कर्मचारी तो दुबई से एमिरेट्स का डेली पैसेंजर  पास बनाकर नौकरी कर रोज वापस दुबई जा सकते हैं।पर हाँ फिर भी कुछ बदलाव की जरुरत अभी भी है दिल्ली मेट्रो को बेहतर बनाने में।

⇛ मसलन, चढ़ने के लिए एस्केलेटर लगे हैं और उतरने के लिए सीढ़ियाँ मगर सीढ़ियों पर जिस कदर का सन्नाटा पसरा रहता है वहां गद्देदार स्लाइडर लगा देना चाहिए ।

⇛ बिना बेंच वाले डब्बे लगाने चाहिए ताकि सब खड़े होकर ही यात्रा करे इसके बिना मेट्रो के अंदर सम्पूर्ण साम्यवाद की कल्पना मुश्किल है वरना शुरुवात स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुलने के बाद लोग ऐसे दौड़ते है जैसे बाड़ा तोड़ कर भागी भैंस।सबको कुचलते मसलते हुए जिसको वृद्ध और महिलाओं की सीट छोड़कर सीट मिल गई उसके चेहरे का सुकून देखते बनता है ।
 
⇛ मेट्रो में खड़े हुए अपनी यात्रा के दौरान योग कैसे करे इसके निर्देश लगा देने चाहिए । मसलन अगर आपको बैठने की जगह न मिले तो दोनों हाथो से दो लटके हुए हैंडल को पकड़ कर तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें।इससे ज्यादा से ज्यादा शुद्ध हवा आपके फेफड़ों में जाएगी क्योकि मेट्रो से बहार निकलते ही फिर आपका सामना Ph level से होना होता है ।

⇛  सांसो पर नियंत्रण करने के लिए अपने सांसो को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बिच के अनाउंसमेंट के बिच रोक कर रखे ।शुरुवात छोटी दुरी के स्टेशन से करे ।

वैधनिक चेतवानी : गुड़गावं जाने वाले अर्जनगढ़ से गुरु द्रोणाचार्य के बीच श्वास नियंत्रण न करे वरना आपकी सांसे उखड सकती हैं ।

आप भी अपने सुझाव जोड़ सकते हैं ।कार छोडिए और मेट्रो के साथ साम्यवाद फैलाइये ।