कल ही देखा था उसको कुछ गुम्सुम सी कुछ खोई सी
वो कशिश नही थी चेहरे पे कुछ सूनापन कुछ रोई सी |
यू तो अक्सर बाते करती थी ,कुछ निस्छल सी कुछ अल्लहड़ सी
मैं भी सुनता था उसको ,कुछ भावुक सा कुछ आबूध सा |एक हिम्मत की शायद कुछ पुछु, पर नीर दिखा उन आँखो मे
एक तिल भी हिल ना पाया मैं, वो ओझल हुई बस सांसो मे |
पिछे उसकी माँ थी शायद, कुछ तेज कदम कुछ चंचल सी
रौबदार और शालीन ,ममता के कुछ आँचल सी |
एक सुकून था उस चेहरे पे, जैसे उऋण होकर आई हो
कुछ दूरी थी उन रिश्तो मे, शायद सग़ी नही पराई हो |
क्या बात हुई होगी उसके संग ,सोचा था ये भोर पहर तक
मुर्दनी क्यों छाई थी उसपर, लकदक रहती थी जो कल तक |
अहली सुबह सुनने मे आया ,वो गर्भ गिरा कर आई थी
एक छोटी सी गुड़िया थी ,शायद जो उसकी ही परछाई थी.
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