Wednesday, August 18, 2021

आहट

जब बिना रीढ़ के अखबारों में राजा की बात हीं छपती हो,
जब कलम करे कोताही और खबरों की हेराफेरी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब भेड़चाल में सारी भेड़े ऊँचे स्वर में हुंकार भरे,
जब लाखों मौतों पर भी न कोई शासन का प्रतिकार करे ,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब धर्म का चोला ओढ़े कोई साधु बड़ा व्यापारी हो,
जब मठ का कोई मठाधीश शासन में सत्ताधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब अनपढ़ अवसरवादी राजा सिर्फ भूतकाल में बात करे,
और वर्तमान की चौखट पर भविष्य के साथ भी घात करे,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब मंदिर मस्जिद के मुद्दों पर सत्ता की दावेदारी हो,
जब सफेदपोशो के मंचो पर कोई टोपी या भगवाधारी हो,
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |

जब केसरिया और हरा रंग अलग अलग लहराते हों,
छत की मुंडेरों से लटके अपनी मज़हबी पहचान बताते हों, 
तब समझो ये आहट है मुल्क के बद से बद्तर हो जाने की |


1 comment:

  1. दिनकर जी की विरोधी प्रवृत्ति कुलांचें भर रही है कवि के मनमस्तिष्क में। आशा करता हूँ ये सृजनात्मकता और भी विकसित होगी और इस अंधेरे कालखंड को प्रकाश पथ दिखाएगी।

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