हम रोज दफनाये जाते है थोड़ी और गहरी कब्र में,
मायूस मुलाजिम की तरह अपनी नाउम्मीदीयो के साथ।
उम्मीदों के टूट जाने का हस्र बहुत ही बुरा होता है,
कोई कब तक संभाले खुद को इन रूश्वाईयो के साथ।
किसी शाखे गुलशन पर नहीं है बसेरा अपना ,
हम तो लिपटे है जड़ो में ही अपनी तनहइयो के साथ।
ये माना की सफ़र लम्बा है और अनजान है मंजिल,
चलने का हौसला है क़यामत तक अपनी परछाईयो के साथ ।
हर बिखरते सपने को संभाला है इन बोझल आँखों में,
उजाला लुट न ले सबकुछ सुबह की अंगड़ाईयो के साथ ।
अनजान शहर में पनपने का मतलब उखड जाना नहीं होता
हम बंधे है आज भी उसी शिद्दत से अपनी मिट्टी की गहराईयो के साथ
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