Friday, December 27, 2013

हमारी उम्मीदे ग्लोबल और सोच कट्टर होती जा रही है

हमारी उम्मीदे ग्लोबल और सोच कट्टर होती जा रही है | हम मल्टीनेशनल में काम करना चाहते हैं , ग्लोबल ब्रांड पहनना चाहते हैं और US का वीजा भी चाहते है लेकिन नेता हिंदूवादी चाहते है जो हमारे कट्टरपन पर रंग रोगन करता रहे | हम पढ़ते Dan Brown और Paulo Coelho को हैं नहीं भी पढ़ा है तो नाम तो जरूर लेते है अगर प्रेमचंद या फनीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा है तो नाम नहीं लेते इससे पिछड़ेपन को बोध होता होगा, मगर अपनी धार्मिक अन्धता को प्रदर्शित करने में हमे जरा भी हिचक नहीं होती है | मुझे हिंदूवादी सोच वालो से कोई शिकायत नहीं पर मै उन्हें कभी सहन भी नहीं कर पाता उसकी वजह भी एक ये है की उन्हें अपनी खुद के द्वारा कही बात का वजन ही नहीं पता वो अपनी दो टक्के की बात भी हजार टेक वाले दंभ के साथ कहते हैं | वैसे समर्थको के ज्ञानचछु खोलने के लिए एक कट्टर हिंदूवादी को नेतृत्व देना चाहिए | भोजपुरी की एक कहावत है  “हाथी आइल हाथी आइल हाथी पदलख टे “ | एक बार हाथी को देख लेने में ही इस देश का भला है कम से कम कुछ सालो के लिए ही सही बाकि हिंदूवादी हाथी जो हिन्दुवों को अल्पसंख्यक मानते है वो दुहाई देना  बंद कर देंगे |

 हर हिंदूवादी नेता के समर्थक हिन्दुवों को एक पीड़ित और शोषित के रूप में इंगित करते है और अपने नेता को हिन्दुवों का तारणहार जबकि हिन्दुस्तान में हर जाति हर वर्ग जो जहाँ अल्पसंख्यक है खुद को शोषित के रूप में देखता है कहीं हिन्दू-मुस्लमान जहाँ हिन्दू-मुसलमान मिश्रित न हो वहां जातिगत आधार पर | और हर ऐसी जगह कोई छोटा या बड़ा तारणहार हो ही जाता है जो अपने बूते के बाहर की बात के लिए अपने से बड़े तारणहार की दुहाई देता है और ये बड़े तारणहार आपकी वक्तिगत झगड़े को धर्म और जाति के लफ्जो लुवाबो के साथ लपेट कर धार्मिक और जातीय फसादों में तब्दील करना बखूबी जानते है |

धार्मिक कट्टरता का हमारी शिक्षा से कोई सरोकार नहीं ये तो बस उपज जाती है , इसका बीज तो हम सब में अपने जन्म के साथ ही पड़ा रहता है हम और आप इसपर कितनी मिट्टी और कितना पानी देते हैं उस हिसाब से ही अंकुरित होकर पनपता रहता है | एक बार पनपने के बाद ये हमारी हैसियत के हिसाब से ही बड़ा होता चला जाता है इसी की आड़ में हम कभी खुद को राजा तो कभी शोषित घोषित करते रहते है | जैसे जैसे हमारी हैसियत बढती जा रही है वैसे वैसे हमारी कट्टरता भी तीव्र होती जा रही है मसलन पहले दंगे किसी घटना या दुर्घटना से प्रेरित होते थे , आजकल तो हम facebook के एक झूठे विडियो पर भी अपने धर्म की ठेकेदारी कर मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं |

 धार्मिक से ज्यादा अधार्मिक कोई दूसरा नहीं होता इनकी भावनाये इतनी कोमल होती है की हर दुसरे दिन आहत होकर जख्मो को भरने के लिए रक्तरंजित करने से भी नहीं चुकती और अधार्मिक की धार्मिकता को ठेस मारना बड़ा मुश्किल होता है | इंसानियत की परिभाषा शायद अधार्मिकता में ही छुपी है इसलिए ग्लोबल धार्मिक होने से अच्छा है देशी अधार्मिक बनिए | इंसानियत की अदब सिखने का यह प्रयोग बुरा नहीं है कर कर देखिये शायद हम अपने समाज की कमजोरियों को खुद ही मिटा पाए बिना किसी राजनितिक उथल पुथल के |

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