Wednesday, January 11, 2017

थोड़ी दूर

कुछ टूट रहा है मेरे अंदर ,कुछ रिश्तो की डोर भी छूट रही ,
राह चले चलने की  जिद में ,मंजिल भी पीछे छूट रही ।

खूब सहेजा था वर्षो तक ,वो यादें जाने किधर गई ,
कुछ यारो की भी यारी थी ,जो प्यालो में घुल कर बिखर गई ।

कुछ तेरा था जो ले आया मैं ,कुछ मेरा था जो छोड़ दिया ,
कुछ कसमे वादे भी लाया था ,उन सबको कब का तोड़ दिया ।

एक घड़ा था रिश्तो का जो ,भरकर भी खाली रहता था ,
आज उन्ही कुछ नए रिश्तो में ,खालीपन से भर जाता हूँ ।

कल होगा बेहतर कुछ अपना ,पर कितने आज गवाऊंगा ,
जो बिखर रहा है रोज निरंतर वो किस किस को बतलाऊंगा ।

ये माना जीना आसां  है ,पर सूनापन तन्हाई है ,
दिनभर बातें करता हूँ जिससे ,वो मेरी ही परछाईं है ।

एकांत मेरा प्यारा है मुझको ,पर इतना भी ना की निर्जन हो ,
एक छोटी सी बगिया हो अपनी , उसमे थोड़ा सा सावन हो ।




Tuesday, November 22, 2016

I am a Progressive Patriot


इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में मृतक संख्या बढ़कर 146 हो गई है।  मृतकों में से 110 लोगों की पहचान की जा चुकी है और 97 शव परिजनों को सौंप दिए गए हैं।

सब चुप हैं, कोई सवाल नहीं कोई सफाई नहीं , मुआवजा बटने लगा है जाँच कमेटी बना दी गई है ।

अजी ये भी मरना कोई मरना है , कौन लेगा इसकी जिम्मेवारी , ऐसी मौत से किसी के खून में उबाल आता है भला ? ये तो हमारे ही लोग हैं हम जैसे चाहे मार दे ट्रैन में मार दे या पूल गिरा कर । भूखो मार दे या शराब पिला कर । यात्री थे, यात्रा पर ही थे ,जहाँ उतरना था वहाँ से थोड़ा आगे चले गए । कोई बॉर्डर पर खड़े थोड़ी न थे की देशभक्त या शहीद का दर्ज दे दिया जाये , ट्रैन में भला कोई देशभक्त होता है ?  देशभक्त या तो बॉर्डर पर रहता है या Facebook  और Twitter पर । जबतक  बॉर्डर के आस पास आपकी छाती में पाकिस्तान का बुलेट न लगे आपको देशभक्त कैसे माना जायेगा ।

यद् रहे हमारा खून तभी ख़ौलता है जब पाकिस्तान की बॉर्डर पर कोई मरता है नेपाल बर्मा या भूटान पर नहीं , बाकि आपकी मर्जी आप जहाँ मर जाओ ट्रैन में मरो या अस्पताल में , दारू पि कर मरो या बिना पिए ही मर जाओ।  दंगो में मरो या दर्शन में, मंदिर के लाइन में मरो या ATM की लाइन में ,हिंदुस्तान में बनी गोली से मरो  या किसी तलवार से काट दिए जाओ । बड़ा सवाल ये है की मरे कैसे ? सड़क दुर्घटना का शिकार हुए ? ट्रैन हादसे में मर गए ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? कितने मरे?........ 150 बस !



पता करो मुआवजा बट गया  न। ... बेचारे कितने दिनों से इस मुआवजे का इंतजार कर रहे थे मनोकामना अब पूरी हुई। जो बच गए वो अफ़सोस मना रहे हैं। कोई बात नहीं फिर से टिकट लेना यात्रा करना फिर किसी दिन संयोग होगा। इसी रेलगाड़ी के बारे में सोचते रहे तो बुलेट ट्रैन कैसे लाएंगे। हमारे नेता हाइवे पर जेट touchdown करवा रहें है आप लोग रेल का रोना रोते  रहोगे ।  You Know ....... There is a word called "Progressive Patriot" and you just don't know it. ... and therefore, both literally and figuratively you unable to see the big picture. 



हम स्मार्ट सिटी बनाएंगे अब जिस सिटी में आप साँस नहीं ले पा रहे हो उसपर टाइम क्यों ख़राब करे । हम बुलेट ट्रैन चलाएंगे स्काई ट्रैन चलाएंगे ये अंग्रेजो की बनाई रेल लाइन पर अपना हुनर क्यों बर्बाद करे ।
अब तो हम जापान और चीन की सहायता ले ले कर जापान और चीन से आगे निकलने की राह पर हैं । Opss.. sorry चीन नहीं , चीन के झालर का तो अभी बहिस्कार किया था, आगे सोचा जायेगा फिलहाल नहीं ।

फिलहाल तो गिनिये कितने मरे, कौन गया, कौन नहीं गया, किसने कितना बांटा ,किसने नहीं बांटा । किसके शासन में कितनी पलटी और कितने मरे।

और हाँ सबसे जरूरी बात ट्रैन दुर्घटना में मरने वालो का धर्म और जाति नहीं देखी जाती  , तो उसकी अभी कोई जरूरत  तो नहीं है अगली बार से देखेंगे  -----------




Friday, April 1, 2016

दिल्ली मेट्रो और उसका साम्यवाद


साम्यवाद और सहिष्णुता का जीवंत उदहारण देखना हो तो दिल्ली मेट्रो की सवारी कीजिये एकदम सहिष्णु और उदारवादी समतामूलक समाज जिसकी कल्पना कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने भी नहीं की होगी। उम्र,धर्म,जाति,लिवास,पेशा और हैसियत इन सबका चूरमा बनकर एक शब्द बनता है "यात्रीगण"।अलग अलग उम्र , धर्म और जाति के गण अपने अलग अलग लिवास में अपने पेशे के प्रति निष्ठा को मजबूत करते हुए अपनी हैसियत के हिसाब से मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते ही मेट्रो के पेट में समाने के लिए बेचैन दिखने लगते हैं यहाँ इन सब की एक ही पहचान होती है "यात्रीगण"। हुड्डा सिटी सेंटर से साकेत तक आने में ऐसा लगता है मेट्रो अपने गर्भावस्था का एक चरण पुरा करती है।

शाम के 6 बजे हुड्डा से MG रोड तक आते आते मेट्रो के डिब्बों का पेट पूरा फुल जाता है एकदम ठस, क़ुतुब मीनार आते आते  crawilling शुरू हो जाती है और साकेत आ कर ऐसा लगता है डिलीवरी हो गई , लोग फिसल कर सबसे पहले कार्ड लगाकर निकलने की होड़ में ऐसे भागते हैं जैसे अब दुबारा लौट कर नहीं आने वाले ,पर फिर सुबह होते ही जिस तेजी के साथ फिर प्रवेश करते हैं तो लगता है जैसे इन 12,13 घंटे की विरह बड़ी मुश्किल से गुजारी है।ठीक यही नजारा नोएडा सिटी सेंटर से राजीव चौक के बिच होता है।पर इनसबके बीच जो सबसे अच्छी बात होती है वो है अनुशासन।स्वनियंत्रित और स्वअनुशासित लोगो की भीड़ एक दूसरे से बिना कोई भेद भाव और बिना किसी परेशानी के बस चलती रहती है।सब व्यस्त हैं अपने अपने स्मार्टफोन के साथ, कान में हेडफोन लगाए हुए ,बिना एक दूसरे से बात किये हुए ,इनमे कुछ ही मेरे जैसे असमाजिक होंगे जो इस सब को किसी नजरिए से देखते होंगे ।

बाकि किसी भी यातायात के माध्यम में आप साथ चल रहे लोगो को उनके एकदूसरे से रिश्ते की पहचान कर सकते हैं पर मेट्रो में रिश्ते पहचानना मुश्किल है।अरे जनाब अनुशासन का ऐसा नजारा आपको मिल ही नहीं सकता की बीवियाँ भी बिना कुछ बोले पूरी यात्रा कर लेती है, कुछ अपवाद हर जगह होते हैं पर बीवियों को ऐसा अनुशासन सिखाने का काम अगर कोई कर सकता है तो इससे नायाब चीज आपको शायद ही देखने को मिले ।

हर स्टेशन का अपना अलग नजारा है जैसे साकेत के बाहर चबूतरे पर एक लाइन में बैठे लोगो का कारण आज तक नहीं समझ पाया आखिर किसके इंतजार में बैठे है।वहीं रेसकोर्स और जोरबाग स्टेशन देख कर लगता है यहाँ से कोई उतरता चढ़ता भी है या नहीं ? अगर कमाई के हिसाब से तन्खाह बटने लगे तो यहाँ के कर्मचारी को सुबह शाम की चाय मिल जाये वही बहुत है बाकि रोटी का खर्चा केंद्रीय सचिवालय स्टेशन से लेना पड़ेगा।राजीव चौक के कर्मचारी तो दुबई से एमिरेट्स का डेली पैसेंजर  पास बनाकर नौकरी कर रोज वापस दुबई जा सकते हैं।पर हाँ फिर भी कुछ बदलाव की जरुरत अभी भी है दिल्ली मेट्रो को बेहतर बनाने में।

⇛ मसलन, चढ़ने के लिए एस्केलेटर लगे हैं और उतरने के लिए सीढ़ियाँ मगर सीढ़ियों पर जिस कदर का सन्नाटा पसरा रहता है वहां गद्देदार स्लाइडर लगा देना चाहिए ।

⇛ बिना बेंच वाले डब्बे लगाने चाहिए ताकि सब खड़े होकर ही यात्रा करे इसके बिना मेट्रो के अंदर सम्पूर्ण साम्यवाद की कल्पना मुश्किल है वरना शुरुवात स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुलने के बाद लोग ऐसे दौड़ते है जैसे बाड़ा तोड़ कर भागी भैंस।सबको कुचलते मसलते हुए जिसको वृद्ध और महिलाओं की सीट छोड़कर सीट मिल गई उसके चेहरे का सुकून देखते बनता है ।
 
⇛ मेट्रो में खड़े हुए अपनी यात्रा के दौरान योग कैसे करे इसके निर्देश लगा देने चाहिए । मसलन अगर आपको बैठने की जगह न मिले तो दोनों हाथो से दो लटके हुए हैंडल को पकड़ कर तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें।इससे ज्यादा से ज्यादा शुद्ध हवा आपके फेफड़ों में जाएगी क्योकि मेट्रो से बहार निकलते ही फिर आपका सामना Ph level से होना होता है ।

⇛  सांसो पर नियंत्रण करने के लिए अपने सांसो को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बिच के अनाउंसमेंट के बिच रोक कर रखे ।शुरुवात छोटी दुरी के स्टेशन से करे ।

वैधनिक चेतवानी : गुड़गावं जाने वाले अर्जनगढ़ से गुरु द्रोणाचार्य के बीच श्वास नियंत्रण न करे वरना आपकी सांसे उखड सकती हैं ।

आप भी अपने सुझाव जोड़ सकते हैं ।कार छोडिए और मेट्रो के साथ साम्यवाद फैलाइये । 

Monday, July 20, 2015

किताब या धर्मग्रन्थ !


जो इंसानो की कदर करना भूल जाता है धर्म की रक्षा पर निकल पड़ता है ।जिस तरह गाय पालने वालो से ज्यादा गो रक्षा करने वाले हो गए है । फेसबुक और ट्विटर पर राष्ट्र्भक्त दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं लेकिन इनमे से सेना में कोई नहीं है ।अपनी छद्म राष्ट्रभक्ति और धार्मिकता को अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर एकदूसरे को निचा दिखाने का नया और सुलभ हथियार मिल गया है ।

हर सवाल के जवाब में इतिहास की कब्र खोद तथाकथित महापुरषो की अस्थियां दो मिनट में आपके दीवाल पर लटका दी जाएँगी ,अब इन्हे कोई ये क्यों नहीं समझाता की अस्थियां विसर्जित करने के लिए होती हैं वितरित करने के लिए नहीं |

इतिहास दफ़न करने के लिए लिखा जाता है कुछ सिखने के लिए नहीं ।इतिहास हमेशा युद्ध का ही क्यों लिखा जाता है ? ताकि आपको अगले युद्ध के लिए तैयार किया जा सके ? अगर इतिहास से सीखना होता तो द्धितीय  विश्वयुद्ध का नाम नहीं होता । हाँ उसी युद्ध को लड़ने के अलग तरीके जरूर ढूंढ लिए गए कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है तो कोई आतंकवाद के नाम पर। जो जीतेगा उसका इतिहास फिर लिखा जायेगा ।

जिस दिन इतिहास दफ़न करेंगे उस दिन इंसानियत के रास्ते का पहला कदम होगा वर्ना हर उस कदम को आपका इतिहास अपनी कब्र में खिचता रहेगा । सबकुछ साथ लेकर लुढ़कना आसान है पर चढ़ाई चढ़ने के लिए एक एक कर चीजो को छोड़ना पड़ता है । चुनाव तो आपका ही होगा अपने इतिहास की पोटली के साथ लुढ़कना है या अपने इतिहास के बोझ से हल्का होते हुए आगे चढ़ना है ।बस इतना ध्यान  रखियेगा की जितने बार अपने इतिहास के कब्र  में जायेंगे आपकी ऐतिहासिक पोटली और  भारी  होती जाएगी ।

दुनिया में लड़ाई कभी धार्मिक और अधार्मिक लोगो के बीच नहीं हुई है जब भी हुई है दो धर्मो के बीच हुई है ।  धार्मिक बनाना दुनिका का सबसे आसान काम है , बनिए धार्मिक पर एक किताब के साथ नहीं | अपने धर्म की किताब बदलते रहिये जब पिछले 1000 सालो में सबका पहनावा बदल गया ,खान पान बदल गया ,रहने से लेकर आने जाने का तरीका बदल गया, यहाँ तक की भाषा बदल गई हर 10 सालो में स्कूल कॉलेज का सीलेबस बदल जाता है पर सबके अपने अपने धर्म की किताब कभी नहीं बदली ।

ऐसा लगता है की उस आखरी लेखक की मौत के बाद कोई उससे अच्छा लेखक आज तक पैदा ही नहीं हुआ |  अच्छा है , नहीं बदलना चाहते है तो एक दूसरे से एक्सचेंज कर लीजिये , हो सकता है आपको अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का तरीका मिल जाये ।

किसी पर सवाल करना उसका अपमान करना नहीं होता बल्कि उसके साथ अपनी सहमति बनाने की कोशिश होती है फिर धर्म पर सवाल करने के नाम पर सारे असहज क्यों महसूस करने लगते है । क्यों धर्म की रक्षा के नाम पर तलवार की जरुरत होती है ? और क्यों रक्षा की जरुरत भी है ? क्यों कोई धर्म खुद के आडम्बरो से असहमत होने की इजाजत नहीं देता ? दो धर्मो को जब आपस में लड़ने का मौका नहीं मिलता तो एक ही धर्म में कई गुट हो जाते है फिर वो आपस में लड़ने लग जाते है ।

धर्म छोड़ना थोड़ा मुश्किल काम है इसके लिए आपको सारे भुत और भगवान के भय से मुक्त होना पड़ता है अपनी धार्मिक सोच से मुक्त होना पड़ता है । धर्मग्रन्थ को किताब समझ कर पढ़ना पड़ता है पूजनीय समझ कर नहीं , उसपर सवाल करने पड़ते है। कोई धर्म लेकर पैदा नहीं होता बल्कि पैदा होने के बाद धर्म चिपकाया जाता है और फिर उसे उखाड़ना बड़ा मुश्किल होता है ।धर्म छोड़ने का मतलब ये नहीं एक को त्याग कर दूसरे को अपना लिया, ये तो बस इस नाव से उस नाव में बैठने जैसा है । धर्म छोड़ने का मतलब खुद तैरना सीखना है किसी नाव की सवारी नहीं।

धार्मिक नहीं होना मतलब अधार्मिक नहीं होता ,हालांकि अधार्मिक जैसा शब्द भी धार्मिक लोगो ने ही ईजाद किया है ।  धार्मिक होना भी बुरा नहीं है पर अपने अपने धर्म की किताब हर 10  सालो में आपस में बदल लिया कीजिये ठीक उसी तरह जैसे स्कूलों सीलेबस बदल जाता है । या फिर इस झंझट से अच्छा है अधार्मिक हो जाइये और किताबो को किताब की तरह पढ़िए धर्मग्रन्थ की तरह नहीं । शायद एक दूसरे को धार्मिक पहचान के साथ नहीं उसकी पहचान से देखना सिख सकते है ।




Monday, June 8, 2015

Little किसान


भोर पहर के कोलाहल में उसने ,
डर कर सूरज को फिर देखा था।
उग आया था फिर पूरब से ,
विकराल और निर्मम होकर बिना किसी कोताही के ।

कुछ टूटी टहनी शाखों से बिखरी थी सुखी घासों पर ,
एक अलग सा रंग बिखरा था धरती की निर्मम छाती पर।
माघ में भादो की बारिश ने रबी की खेती को लील लिया, 
बनिए के पलड़े ने भी कुछ इधर उधर का खेल किया । 


एक बिटिया है वो भी छोटी है दुधमुँहा एक बच्चा भी है,
साहूकार का कर्ज खतौनी वो भी पूरा कच्चा ही है।
पसीने से लथपथ रहती है चूल्हा करती वो बेचारी ,
दो बैल और एक कुत्ता गिनकर सात पेट की भूख हमारी ।


शहरों में भी कोलाहल है अखबार तो ऐसा कहते हैं ,
भूख की उनको पर नहीं चिंता वो तापमान से डरते हैं।
हर नेता भी चिंतित है संसद की ठंढी लाल दीवारो में,
सहानुभूति भी दे रखी है खम्भो पर लगे इस्तिहारो में।

 
किसानो की आफत को सबने सर पर अपने टांग लिया है ,
पत्र्कार और बुद्धजीवी ने भी अपने कॉलम में बाँग दिया है।
रोज एक मुर्दे का किस्सा अन्नदाता के नाम पर रहता है ,
अनुदान की राशि बट गई ये हर सरकारी बाबू कहता है ।

थाली सबकी ये भरते है यह किस्सा तो सब कहते हैं ,
पर सबके जूठन की कीमत पर भूखे पेट भी ये मरते है ।
किस पत्थर को पूजे अब और किससे ये मनुहार लगाये  ,
या गलफांस लगाकर अब शांत शिथिल मृदुल हो जायें ।


Wednesday, November 19, 2014

हिसार (हरियाणा) : देवता और दानवों के बिच संघर्ष जारी !


हिसार: हरियाणा पुलिस अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद संत रामपाल को उसके हिसार के बरवाला आश्रम से गिरफ्तार नहीं कर सकी है। आज पांच दिनों के इंतजार के बाद पुलिस की करवाई दिन के 12 बजे से शुरू हो गई। आप बने रहिये हमारे साथ क्युकी अभी आपकी आँखों के लिए बहुत मसाला बाकी है |

कोई इसे मीडिया की नौटंकी तो कोई बाबाओ की कारगुजारियो के रूप में देख रहा है परन्तु असली भक्त वही है जो रामपाल और पुलिस के इस संघर्ष को देवता और दानवों के संघर्ष के रूप में देखे | हे भक्तो इससे आपके लिजलिजाये विश्वास को नया सहारा मिलेगा |

इस सत्संगी संसार में तीन प्रकार के प्राणी पाए जाते हैं बाबा
, भक्त और दानव बाबा और भक्त दोनों एक दुसरे की बैसाखी है | भक्त के बिना बाबा नहीं बाबा के बिना भक्त नहीं | बाबा या भक्त बनाये नहीं जाते ये तो पैदा होते है | हमारे यहाँ भक्तो की पैदावार ज्यादा है जो आतुर रहता या रहती है किसी ना किसी बाबा के संसर्ग में आने को और दानव वो है जो इन दोनों (बाबा और भक्त ) को शंका की दृष्टी से देखता है |


अजी लानत भेजिए इन मीडिया वालो को जो अपनी TRP रेटिंग के लिए इन बेचारो भक्तो का काम बढ़ाते रहते है | अब इन्हें नई शुरुवात करनी पड़ेगी एक नए बाबा की खोज में जो अबतक तकरीबन तठस्थ हो चुके भक्तो के विश्वास को धुल मल गया | ये मिडिया वाले भी दानवों के फ़ौज की ही एक इकाई हैं डंडे तो इन्हें पड़ने ही चाहिए थे | ये तो देवता का कमाल देखिये जो इनकी ही भस्मासुरो वाली बिरादरी की लाठी से इनकी मजम्त करा गया|

अब लड़ेंगे ये आपस में ही
, एक नया कमीसन बैठेगा इनके आपस के ही टकराव की जाँच को | दानव हथियार का सहारा लेता है और देवता दिमाग का | देवता और दानवों का यही अंतर तो जुदा करता है एक दुसरे से , वरना शक्ल तो सबकी एक जैसी ही होती है | तभी तो दानव रोज पैदा होते है और देवता कभी कभी अवतार लेते हैं | देवताओ की भी अपनी मज़बूरीयां है साहब की इन्ही दानवों की फ़ौज से इन्हें अपना भक्त बनाना पड़ता है जो जरुरत पड़ने पर अपने देवता के लिए हथियार उठा कत्लेआम मचा दे |

किसी पत्रकार ने लिखा की आश्रम की रिपोर्टिंग करते हुए वो आश्रम के अन्दर दानव से भक्त में  रूपांतरित हुए प्राणियों द्वरा वितरित की जा रही चाय भी नहीं पीते थे क्योंकी जिस दूध से चाय बनाई जाती है उस दूध का उपयोग पहले बाबा को नहलाने में किया जाता है, अब इस बात की सचाई वो ही जाने परन्तु इस चायरूपी प्रसाद का अनादर कर कोई देवता के प्रकोप से कैसे बच सकता है |

इनमे से कुछ वैसे भी होंगे जो इस बाबा की वजह से अपने बाबा पर भी एक बार शक किया होगा अब शक किया तो सजा तो मिलेगी वरना भगवान का भय ही ख़तम हो जायगा | भय से ही तो भगवान का विस्तार होता है | भक्तो अपने अपने भय को भी संभाले रखिये क्योंकी भय से भगवान और भक्ति दोनों आते हैं | जिस दिन आपने अपने अंदर के भय को मार दिया समझो भगवान और भक्ति दोनों मर जायेंगे | भगवान मरा तो भक्ति मर जाएगी , भक्ति मरी तो भक्त मर जायेगा , भक्त मरा तो बाबा मर जायेगा और ये पूरा तंत्र चरमरा सकता है इसलिए अपने भय को पालते रहिये |

भक्तो से विनती है की अपने अपने बाबा की तस्वीर और चरणपादुका अपने अपने घरो में संभाल कर रखिये ये आपके कमजोर होते विश्वास को सिंचित तो करेगा ही साथ ही साथ आपकी अधूरी मनोकामनाए भी पूर्ण कर आपको मोक्ष की प्राप्ति कराएगा |


वैसे मोक्ष तो भगवान को भी नहीं मिला है , वरना बार बार अवतरित कैसे होता
अजी इस सवाल को छोड़ दीजिये ये दानवों के सवाल हैं
|  


Wednesday, April 9, 2014

आप नाराज़ क्यू हैं ?


आप नाराज़ क्यू हैं ?

कोई मोदी से नाराज़ है ,कोई केजरीवाल से , कोई राहुल से नाराज़ है , कोई बीजेपी से , कोई  कांग्रेस से , कोई वाम से तो कोई आप से (अपने आप से अरविंद वाले आप से नही ) । इस नाराज़गी का आलम देखिये हर कोई एक को छोड़कर बाकि सबसे नाराज़ है ,एक से ही नाराज़ होकर रहेगा तो NOTA दबाना पड़ सकता है| आप सबकी नाराज़गी किसी ना किसी पार्टी को लेकर है , व्‍यवस्था को लेकर तो बिल्कुल नही है व्‍यवस्था को लेकर नाराज़ रहते तो इस महान लोकतंत्र के पावन पर्व का बहिकार ना कर देते, लेकिन आप ऐसा कर नही सकते क्योकी आप को भी पता है की ये व्‍यवस्था भी आपने ही बनाई है |

आप उस समाज का हिस्सा है जो सुबह सड़क पर टट्टी करके दोपहर मे खुद चिल्लाता है किसी ने साफ क्यू नही किया? आप उस सारे अनैतिक कामो पर ताली बजाते है जो आप खुद करना चाहते है , वैसे भी ताली और ग़ाली इन दो कामो के अलावा आपने कुछ सीखा भी तो नही  |  आप या तो खुद को दिखाए जानेवाले सपनो पर ताली बजा सकते हैं या उन सपनो के पूरा नहीं होने पर गाली दे सकते है । आप उस समाज का हिस्सा है जो भूत और भविष्य मे जीता आया है ,वर्तमान से तो कोई सरोकार ही नही , आप भूतकाल मे विश्वगुरु थे और भविष्य मे सुपर पावर होने जा रहे है , वर्तमान मे क्या है ये तो देखने की फ़ुर्सत कहाँ आपको । है  क्या ? आप की नज़र तो भूत और भविष्य का मेल कराने की है |

माफ़ कीजिएगा भाववेश मे कुछ ज़्यादा ही बक गया , मेरा इरादा आपकी भावनाओ को आहत करना नही था । अब भावना की बात आ ही गई तो एक बात और कह ही देता हूँ, यही एक चीज़ है जो आप अपने साथ हमेसा अपने साथ लेकर चलते है अरे जनाब इतनी नाज़ुक चीज़ कही संभाल कर रखिए घर मे कही तिजोरी मे बंद कर के रखिए या कही सरकार से कह कर बैंक ही खुलवा लीजिए , लेकिन आप भी कितने भोले है जो हर किसी को दे देते है इसे आहत करने के लिए | कोई मंदिर के नाम पर, कोई मस्जिद के नाम पर , कोई कश्मीर के नाम पर तो कन्याकुमारी के नाम पर, जाती ,धर्म ,किताब ,सिनेमा ,आचार ,विचार, ख़ान ,पान ,कपड़ा ,लता, लोक ,लाज हर चीज़ से तो आप आहत हो जाते हैं| आप आहत हो यहाँ तक तो ठीक है ,पर जनाब आप अपने साथ आस पास को भी आहत करने लग जाते है | उफ़ ये बात भी कहाँ से कहाँ तक चली आई |

अब बस !

बात तो चुनाव की शुरू हुई थी ये खामखां आपको कोसने मे लग गया , मै  तो बस ये जानना चाहता था कि आप अपना चुनाव  कैसे करते हैं ? फेसबुक से ?ट्विटर से ? शहर में लगे बड़े बड़े होर्डिंग से ? नेता जी के कहे भाषण से ? अपनी जातीय और धार्मिक कट्टरता से ? विकास  के मैनिफेस्टो से ? या फिर कुछ ले दे कर ? कुछ तो जरुर एकदूसरे से अलग करते होंगे वर्ना एक ही पार्टी को देश का बेडा गर्क करने का दोषारोपण करने में आपको ६० साल लग गए । दूसरी जिसके सपनो पर सवार होकर उड़ान भरने वाले थे उसे ५ साल में ही हटा दिया और फिर से पहली को ही ले आये क्योंकि इसबार इसने आपको नए सपने दिखाए । आज फिर से वही रोना । अबकी बारी किसकी है ? इसबार तो आपको सबने आपके समय के हिसाब से सपने दिखाए हैं । कोर्ई राशन दे रहा है, कोई रोजगार , कोई स्मार्ट सिटी,
तो कोई व्यापार, कोई बुलेट ट्रैन तो कोई मुफ्त में खाने का जुगाड़।

किसी ने आपके वर्त्तमान को ठीक करने का दावा तो नहीं किया और आपने भी तो नहीं पूछा , अरे पूछते भी कैसे आप तो वर्त्तमान को देखते ही नहीं हो,आपके उपर तो अपने सुनहरे अत्तीत को अति सुनहरे भविष्य से मिलाने कि जिम्मेवारी  है । अगर पूछते तो ये तो जरुर पूछ सकते थे कि "भाई मेरे"  मेरे जो शहर  है उन्ही को ठीक कर दो पहले, स्मार्ट तो बाद में हो ही जाएंगे । अभी चलने वाली रेलगाड़ी ही सही से चला दो बुलेट कि बाद में देखि जायेगी । मेहनत कि रोटी खाने का मौका दे दो अन्न योजना कि जरुरत किसे है ?

लेकिन एक बात तो है आप जागरूक मतदाता है किसी न किसी के साथ आपका मत तो जुड़ ही चूका है और ऐसा करने से पहले एक बार तो आपने जरुर ही देखा होगा कि जो आपकी अगुवाई करने का दावा कर रहा है उसका मिजाज आपके मिजाज़ से कितना मेल खाता है । नहीं देखा क्या ?
अरे मै तो भूल ही जाता हूँ आप तो सिर्फ भविष्य देखते हो वर्त्तमान से आपका सरोकार कहाँ , आप के ऊपर तो देश के भविष्य कि जिमेदारी दी गई है बेशक आप कल सुबह उठ कर फिर उसी सड़क पर टट्टी  करके दोपहर में चिल्लाओगे कि किसी ने साफ़ क्यों नहीं किया । आप अपने अपने इलाके का ही सोच लेते तो देश का कुछ तो भला हो ही जाता ।

फिर भी कही आपको लगे कि अपने नेता जिसे आप वोट देने जा रहे है कम से कम एक बार उसके द्वारा दाखिल प्रमाणपत्र देखना चाहिए तो निचे दिए लिंक पर क्लिक कर के अपना राज्य और अपना क्षेत्र चुन कर नेताजी के नाम पर क्लिक कीजिये देखिये क्या क्या कहा है उन्होंन अपने बारे में, अब जब खुद ही कहा है तो कुछ तो सच जरुर ही होगा ।

http://affidavitarchive.nic.in/DynamicAffidavitDisplay/FrmElectionAffidavit.aspx

इस लेख का किसी पार्टी और पॉलिटिक्स से कोई सरोकार नहीं है इसका मकसद सिर्फ आप को कोसना था