पेड़ तेरी क्या ख्वाहिश होगी पत्ते के गिरने के बाद
याद कर उन्हें रोता होगा आंसू खूब बहाता होगा
वो भी तो तड़पी ही होगी मिट्टी में मिलने के बाद
क्या बनेगा सुखी ठूठ या फिर से आस लगाए होगा
चिडयों के कोलाहल के संग सूरज का हमसाय होगा
क्या तेरी शाखों पर फिर से कोई पपीहा बोलेगा
या किसी आरे की नीचे तू अपनी किस्मत तोलेगा
जड़ें भी तेरी गहरी होंगीं मिट्टी को वह जकड़ी होगी
कितने झंझाबातों से वह अंदर-अंदर बिखरी होंगीं
नई मिट्टी की चाहत में वो मौजों से भी लड़ती होंगीं
सरफिरे किसी हाथों मे कुल्हाड़ी देख भी डरती होंगीं
पर तुझको ना छोड़ा होगा तूफ़ाँ के बहने के बाद
तू तो खूब लरजता था अपनी मोटी शाखों पर
फिर भी पत्ती छोड़ चलीं पतझड़ के आने के बाद
फिर से उसकी चाह लगाए तू मेघों को पास बुलाए
नए कोपल की चाहत में बारिश के गिरने के बाद
पेड़ तेरी क्या ख्वाहिश होगी पत्ते के गिरने के बाद
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