ट्विटर और ब्लॉग में फर्क है !
ट्विटर और ब्लॉग में बड़ा फर्क है, ये वही फर्क है जो जनता और नेता में होता है, वो फर्क है जो बाबा और चेलो में होता है| ब्लॉग आपको वक्ता बनाता है बेशक आपके विचारो में कूड़े की सड़ांध हो और ट्विटर तर्की और कुतर्की | फेसबुक को मै किसी श्रेणी में नहीं रखता ये डस्टबीन है जहा कुछ भी फेक कर चले जाओ कोई न कोई कूड़े वाला कुछ ना कुछ उठा ही लेगा, नहीं उठा तो वही पड़ा पड़ा बजबजाता रहेगा और आप हर दिन ये सोचते रहेंगे की किसी ने उठाया क्यों नहीं ? ब्लॉग एक अहसास देता है खास होने का जहाँ एकतरफा संवाद की गुंजाईस ज्यादा रहती है और जहाँ एकतरफा संवाद की प्राथमिकता मिलती है, वो अहसास आपको विशिष्ट होने का अनुभव कराता है | अब भला विशिष्ट होना किसे बुरा लगता है , नेता स्टेज से चढ़ कर भाषण देता है समर्थक सुन कर ताली बजाते है विरोधी गाली, मगर एकतरफा संवाद का अहसाह कितना सुखद होता है यह उस नेता के अलावा कोई नहीं समझ सकता | बाबा प्रवचन कहते है चेले सुनते है जिन्हें नहीं अच्छा लगा वो अपने घर जा कर बाबा की फजीहत करेंगे, मगर बाबा के प्रवचन के विशिष्ट होने का अहसास आप तब समझेंगे जब आप बाबा हो जायेंगे|
इसीलिए मै सबको कहता हूँ , बाबा बनो चेला नहीं ,डायरेक्ट बाबा बनने में जो मज़ा है वो चेला बन कर बाबा बनने में नहीं है | वही ट्विटर आपको विशिष्ट से आम की श्रेणी में ले आता है | क्योंकी इसमें दोतरफा संवाद का चलन है आपके दो लाइन के विचार पर कोई एक या दो लाइन की टिपण्णी करेगा, फिर से आप दो लाइन का जवाब तैयार करेंगे फिर कोई दो लाइन चिपका कर निकल लेगा| ये बराबर लाइनों का कारोबार हमे कुछ ज्यादा ही उत्तेजित भी कर जाता है और हमे अपने खास होने के चोले के फटने का अहसास होने लगता है | भोजपुरी में एक कहावत है "पडले राम कुकुर के पाले खीच खाच के कईले खाले "मतलब राम का सामना कुत्तो से होता है तो कुत्ते राम को भी नोच खसोट कर गड्ढे में गिरा देते है और राम ये सोचने पर मजबूर हो जाते है की कुत्तो से लगा ही क्यों ? और फिर शुरू हो जाता है रास्ते से संभल कर चलना कुत्तो से बचते हुए भाई आखिर खास बने रहना है या नहीं ? मेरे दो पेज के ब्लॉग पर कोई दो लाइनों की टिपण्णी करता भी है तो क्या औकात है उस टिपण्णी की टुच्ची टिपण्णी "हुह"|
मगर ट्विटर पर ये सहूलियत नहीं है |१२० शब्दों में अपनी बात को समेटना कितना मुश्किल काम है और इतने मुश्किल से सहेजे गई विचारो पर कोई १२० शब्दों की टिपण्णी कर दे वो भी आपके विचारो का खुलेआम कत्त्लेआम करते हुए तो ये कोयल को चिढाने वाली बात है की नहीं ? उसके सुर वाले "कुं " पर किसी का बेसुरा "कुं " कोयल को कितना परेशान करती है, अब बेचारी कितना "कुं कुं " करती रहे | है हिम्मत तो जरा कौवे को चिढ़ा कर दिखाओ | यही कारण है की विशिस्ट लोग ट्विटर से किनारा कर ब्लॉग का सहारा लेने लगे है | वो पुराने दिन चले गए जब ट्विटर पर उपस्थिति खास मानी जाती थी अब सबकी किस्मत शशि थरूर वाली किस्मत तो होती नहीं है! ट्विटर पर होना अब बड़ा आम माना जाने लगा है और खास से आम होना कितना दुखदायी होता है |कोई धनि शौक से उपवास करता है तो इसका ये मतलब न निकला जाये की उसके पास खाने को नहीं है , ठीक उसी तरह कोई शौक से दो चार दिन के लिए आम हो जाता है तो हमेशा के लिए आम हो जाये ऐसा कैसे हो जायेगा |जिस दिन उसे ये अहसास होने लगेगा की ये लो ये तो फोल्लोवर की भीड़ मुझे आम समझने लग गई उसी दिन वो ट्विटर को छोड़ ब्लॉग पर शिफ्ट कर जायेगा |
मेरे भी उंगलियो की गिनती जितने फोल्लोवर मुझे जब से आम समझने लग गए मै भी ब्लॉग पर शिफ्ट कर गया हूँ | मेरे पोस्ट कम है इसका मतलब ये मत समझ लीजिये की मेरे पास विचारो की कमी है , अजी ये सोचिये की टाइम ही नहीं मिल पाता की अपनी सोच को आपके सामने रोज रोज परोश कर मै भी विशिस्ट हो जाऊ |
8 वर्षों में बहुत परिवर्तन आ गया है। ब्लॉग का चलन लगभग समाप्त हो गया है। आम लोगों को ट्विटर पर अंजान लोगों से वाकयुद्ध और द्वंद्व करने में चरमसुख मिलता है मानो शंकराचार्य का शास्त्रार्थ जीत लिया हो। विशिष्ट होने का आनंद तभी है जब 10 सामान्य जन अपने अज्ञान के कोहरे में आपको प्रकाशस्तंभ समझें और उन बौद्धिक विकलांगों का जमावड़ा ब्लॉग जैसे एकतरफा संचार माध्यम पर नहीं है और इसी कारण संभावित विशिष्ट जन इस माध्यम से दूर चले गए। बची खुची क़सर इंस्टैंट नूडल्स की तरह कम से कम मेहनत (240 अक्षर) में कामचलाऊ वार्तालाप कर सकने की क्षमता ने पूरी कर दी। कौन ब्लॉग की बिरयानी बनाये।
ReplyDeleteये पीढ़ीगत बदलाव है वस्तुनिष्ठ परीक्षा का दौर, हाँ ना और चार पंक्तियों में पूरा इतिहास बता देने की सतही मानसिकता का दौर भी l ठहरकर संदर्भ ना कोई बताता है ना कोई जानना चाहता है । वैसे एक तरफ़ा संवाद की ताक़त ही है जो 8 सालो से किसी को मसीहा बनाए हुए है l जिस दिन दोतरफ़ा हुआ फिर पानी माँगना पड जाएगा l ब्लॉग की बिरयानी रोज़ तो बनेगी नहीं पर जब फुर्सत मिले बनानी चाहिये ये 240 शब्दों के पर जाकर भी खुद की लिखने की क्षमता का अहसास दिलाता है l
Deleteवैसे आशा करता हूँ कि आपकी लेखनी इस ब्लॉग को लंबे समय तक समृद्ध करती रहेगी। आपाधापी के इस जीवन में जब IT की नौकरी कोल्हू के बैल के भांति दिन के 15-16 घण्टे तेल निकालती हो तब साहित्य साधना की अभिलाषा मरुभूमि की मृगमरीचिका के समान लगती है। ऐसे में आपके ये ब्लॉग पोस्ट मेरे और साहित्य के बीच में एक पुलिया तो ज़रूर हैं। 😀
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